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मासूमों की सुध

कोरोना विषाणु के संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान ऐसे तमाम लोग बुरी तरह बीमार हुए, जिनका इलाज अभी चल रहा है। कई मरीजों के बच्चे आज लाचारी की हालत में पहुंच चुके हैं। इससे भी ज्यादा बुरी दशा उन बच्चों की हुई, जिनके माता-पिता या उनमें कोई एक संक्रमण का शिकार हुए और उनकी मौत हो गई। खासतौर पर ऐसे परिवारों के बच्चों के जीवन के बारे में कल्पना भी तकलीफदेह है, जिनके दूसरे संबंधी नहीं थे या वे उनकी मदद के लिए आगे नहीं आए।

शुक्रवार, 28 मई, 2021 को सांगली के एक कोविड -19 देखभाल केंद्र में भर्ती एक लड़का। (पीटीआई फोटो)

इस बात की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही थी कि कोरोना महामारी की चपेट में आने के बाद जिन लोगों की जान चली गई या जो अभी भी गंभीर रूप से बीमार हैं, उनके बच्चों को तत्काल मदद मुहैया कराई जाए। इसके लिए पिछले दिनों कई हलकों से आवाजें उठीं और केंद्र सरकार सहित अदालतों ने भी कोरोना के शिकार परिवारों के ऐसे लाचार हो गए बच्चों को लेकर सरोकार जाहिर किए।

अब केंद्र सरकार ने कोरोना की वजह से बुरी तरह प्रभावित बच्चों की देखभाल और संरक्षण के लिए एक जरूरी पहल की है। महिला और बाल विकास मंत्रालय के सचिव की ओर से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को पत्र लिख कर ऐसे बच्चों की देखभाल और संरक्षण के लिए दिशा-निर्देश दिए गए हैं। इसके तहत सर्वेक्षण और संपर्क के जरिए संकटग्रस्त और प्रभावित बच्चों का पता लगा कर उनका ब्योरा तैयार करने के साथ-साथ उन्हें मुख्यधारा में लाने और उनका जीवन सुगम बनाने के लिए राज्यों, जिलाधिकारियों, पुलिस, पंचायती राज संस्थाओं और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारियां तय की गई हैं। मकसद यह है कि महामारी के दौरान बच्चों का बेहतर हित सुनिश्चित किया जा सके।

गौरतलब है कि कोरोना विषाणु के संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान ऐसे तमाम लोग बुरी तरह बीमार हुए, जिनका इलाज अभी चल रहा है। कई मरीजों के बच्चे आज लाचारी की हालत में पहुंच चुके हैं। इससे भी ज्यादा बुरी दशा उन बच्चों की हुई, जिनके माता-पिता या उनमें कोई एक संक्रमण का शिकार हुए और उनकी मौत हो गई। खासतौर पर ऐसे परिवारों के बच्चों के जीवन के बारे में कल्पना भी तकलीफदेह है, जिनके दूसरे संबंधी नहीं थे या वे उनकी मदद के लिए आगे नहीं आए। ऐसे में समाज की भूमिका बनती थी कि वह उनकी सहायता के लिए कुछ करे। लेकिन इस महामारी ने अपने साथ जुड़े खतरों के समांतर लोगों की संवेदनशीलता पर भी घातक असर डाला है और उन्हें दायरों में समेट दिया है।

ऐसे में सरकार की सीधी जिम्मेदारी बनती है कि वह महामारी की परोक्ष मार से जीवन के लिए जद्दोजहद करते ऐसे बच्चों की सुध ले और उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए ठोस पहल करे। यों पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी मसले पर एक अहम सुनवाई के दौरान यह कहा था कि बड़ी संख्या में बच्चे अनाथ हुए हैं। अदालत ने राज्य सरकारों को यह निर्देश दिया था कि वे जल्द से जल्द अनाथ हुए बच्चों की पहचान करें और उनकी देखभाल के लिए कदम उठाएं।

इसी संदर्भ में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दिए एक हलफनामे में कहा है कि राज्यों से मिले आंकड़ों के मुताबिक देश में नौ हजार तीन सौ छियालीस बच्चे ऐसे हैं जो कोरोना संक्रमण की वजह से अपने माता-पिता में से किसी एक को खो चुके हैं। इनमें से सत्रह सौ से ज्यादा बच्चों के माता-पिता की मौत कोरोना विषाणु के संक्रमण से हो गई। जिस दौर में महामारी पर काबू पाने के लिए चारों तरफ सामान्य जनजीवन लगभग बाधित है, उसमें ऐसे बच्चों के दुखों का सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है।

अभावों के बीच जिंदा बचे रहने की चुनौती के बीच वे जिस सदमे से गुजर रहे होंगे, उसमें उनके संरक्षण के साथ-साथ उन्हें मनोवैज्ञानिक सलाह और सहयोग की भी बेहद जरूरत है। इसके अलावा, मानव तस्करों के गिरोह ऐसे मौकों की ताक में होते हैं, जब वे लाचार बच्चों को अपने जाल में फंसा सकें। इसलिए ऐसे बच्चों की पहचान, मदद और उनकी देखभाल की तत्काल जरूरत है। उम्मीद है कि इसके लिए समय पर जरूरी कदम उठाए जाएंगे।

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