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टकराव के बीच

सवाल है कि गुटीय टकराव खत्म कैसे हों और शीत युद्ध के खतरों से कैसे बचा जाए? यूक्रेन पर हमले को लेकर दुनिया जिस कदर खेमों में बंट गई है, वह कम चिंताजनक नहीं है। अमेरिका और यूरोप के कई देश रूस के खिलाफ हैं तो चीन शुरू से रूस के साथ है। भारत शुरू से ही किसी खेमे के साथ नहीं है और शांति का पक्षधर रहा है।

2017 के शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स नेता। (एपी फ़ाइल)

इस बार ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) के चौदहवें शिखर सम्मेलन में यूक्रेन युद्ध, अफगानिस्तान संकट से लेकर शीत युद्ध के खतरों और वैश्विक अर्थव्यवस्था के हालात जैसे मुद्दे उठे। यह बैठक ऐसे मुश्किल वक्त में हुई है जब यूक्रेन पर रूस के हमले जारी हैं और अमेरिका व पश्चिमी देश रूस के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। चीन भी अमेरिका के निशाने पर है। बैठक के उद्घाटन से लेकर समापन तक सदस्य देशों के नेताओं के संबोधन और साझा बयान से साफ है कि बदलती वैश्विक राजनीति और आपसी टकरावों को लेकर हर कोई चिंतित हैं।

यह चिंता चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के उद्बोधन में भी साफ दिखी, जिसमें उन्होंने शीत युद्ध के खतरों को लेकर आगाह किया। जिनपिंग का यह कहना कि शीत युद्ध की मानसिकता और गुटीय टकरावों को आखिरकार छोड़ना ही होगा, बिल्कुल सही है। यही आज की सबसे बड़ी जरूरत भी है। लेकिन विंडबना यह है कि ताकतवर देश ही एक बार फिर से दुनिया को शीत युद्ध और गुटीय टकरावों में धकेल रहे हैं। ब्रिक्स देशों की इस बैठक में उठे मुद्दों को कुछ समय पहले हुई क्वाड देशों के समूह की बैठक का जवाब भी माना जा रहा है।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि साझा बयान में सदस्य देशों ने एक दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीयता अखंडता का सम्मान करने पर जोर दिया। हालांकि ब्रिक्स की बैठकों में ऐसी प्रतिबद्धता पहले भी दोहराई जाती रही है। लेकिन इसे भारत और चीन के संदर्भ में देखे जाने की जरूरत है। सवाल है कि जो चीन एक दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है, गुटीय टकराव खत्म करने पर जोर दे रहा है, पहले वह अपने भीतर झांक कर तो देखे। भारत के साथ चीन का सीमा विवाद तो पुराना है ही, वह अब नए-नए विवाद खड़े करने से बाज नहीं आ रहा। क्या यही दूसरे देश की संप्रभुता की रक्षा करना है?

चीन को यह बात भी खल रही है कि आखिर भारत अमेरिका के नेतृत्व वाले गठजोड़ क्वाड का सदस्य क्यों है? वैसे भारत को लेकर चीन ने कहा है कि साझा मतभेदों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण साझा हित हैं। तो फिर चीन को अपने से क्या यह नहीं पूछना चाहिए कि क्यों वह भारत के साथ सैन्य टकराव बनाए रखने में अपने हित देख रहा है। और सिर्फ भारत ही नहीं, दक्षिण चीन सागर को लेकर कई देशों के साथ उसका गतिरोध छिपा नहीं है। उसकी विस्तारवादी नीतियां उसकी मंशा पर सवाल खड़े करती हैं।

सवाल है कि गुटीय टकराव खत्म कैसे हों और शीत युद्ध के खतरों से कैसे बचा जाए? यूक्रेन पर हमले को लेकर दुनिया जिस कदर खेमों में बंट गई है, वह कम चिंताजनक नहीं है। अमेरिका और यूरोप के कई देश रूस के खिलाफ हैं तो चीन शुरू से रूस के साथ है। भारत शुरू से ही किसी खेमे के साथ नहीं है और शांति का पक्षधर रहा है। रूस पर प्रतिबंधों को लेकर यूरोपीय देशों में भी मतभेद उजागर हो गए हैं।

यह स्थिति ज्यादा टकराव पैदा करने वाली है। क्यों नहीं चीन खुल कर कहता कि यूक्रेन पर हमला बंद हो, ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था को ढहने से बचाया जा सके। क्यों वह भारत के साथ बातचीत को टालने की रणनीति पर चलता है? दुनिया को मुश्किलों से बचाना है तो पहले बड़े देशों को अपने दोहरे और छद्म चरित्र को छोड़ना होगा।

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