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महामारी से जंग

पहली लहर के दौरान देश को महामारी से बचाने के लिए पूर्णबंदी जैसा कठोर कदम उठाना पड़ा था। तब हालात विकट थे और सारी कमान केंद्र के हाथ में थी। राज्य सरकारें केंद्र के निर्देशों को मानते हुए ही कोरोना से निपटने में लगी थीं। दूसरी लहर में भी कमोबेश हालात ऐसे ही थे। लेकिन अब स्थितियां अलग हैं।

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कोरोना काल में अपने घर की खिड़की से नीचे झांकता एक युवक। (प्रतीकात्मक फोटोः unsplash)

तीसरी लहर से निपटने के लिए प्रधानमंत्री ने राज्यों को व्यावहारिक उपायों पर गौर करने को कहा है। गुरुवार को मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि महामारी से जंग के लिए राज्य जो भी उपाय करें, उनमें इस बात का ध्यान सबसे पहले रखा जाए कि लोगों की रोजी-रोटी पर असर न पड़े। पूर्णबंदी के बजाय दूसरे विकल्पों को तलाशा जाए। जाहिर है, अब महामारी से निपटने में राज्यों की भूमिका ज्यादा महत्त्वपूर्ण होगी। यह फैसला राज्यों को ही करना होगा कि कौन-कौन से कदम उठाए जाएं जिससे संक्रमण का प्रसार न हो।

इसके लिए शहरों-कस्बों में ऐसे बंदोबस्त करने होंगे जिससे बाजारों में भीड़ न बढ़े, अस्पतालों को तैयार रखा जाए, दवाइयों और आक्सीजन का पूरा बंदोबस्त हो, टीकाकरण कार्यक्रम तेजी से चले और हालात को देखते हुए राज्य जैसा जहां उचित समझें, खुद फैसला करें कि क्या करना है। बैठक में प्रधानमंत्री ने जो ठोस सुझाव दिए, उन पर ईमानदारी से अमल काफी हद तक लोगों को संक्रमण से बचाने में मददगार हो सकता है। इस वक्त जिस तरह के हालात हैं, उनमें संकट से पार पाने के लिए स्थानीय स्तर पर काम करने और अधिकतम सतर्कता बरतने की जरूरत कहीं ज्यादा निर्णायक होगी।

गौरतलब है कि पहली लहर के दौरान देश को महामारी से बचाने के लिए पूर्णबंदी जैसा कठोर कदम उठाना पड़ा था। तब हालात विकट थे और सारी कमान केंद्र के हाथ में थी। राज्य सरकारें केंद्र के निर्देशों को मानते हुए ही कोरोना से निपटने में लगी थीं। दूसरी लहर में भी कमोबेश हालात ऐसे ही थे। लेकिन अब स्थितियां अलग हैं। राज्यों को महामारी से निपटने का अनुभव हो चुका है। सभी राज्य अपने यहां एक ऐसा तंत्र तो खड़ा कर ही चुके हैं जो महामारी जैसे हालात का सामना कर पाने सक्षम हो।

हालांकि तीसरी लहर में संक्रमण के रोजाना आंकड़ों ने एक बार फिर सरकारों की नींद उड़ा दी है। ओमीक्रान के मरीज भी बढ़ रहे हैं। महाराष्ट्र और दिल्ली जैसे कुछ राज्यों में संक्रमण दर कम चिंताजनक नहीं है। ऐसे में हालात से निपटने के लिए अब जो कुछ भी करना है, वह राज्यों को अपने हिसाब से करना है। हालांकि राज्यों के लिए यह सब कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। देखने में आ रहा है कि बाजारों में भीड़ बढ़ रही है। मकर संक्रांति के मौके पर कई शहरों में स्नान के लिए खासी भीड़ उमड़ी।

पश्चिम बंगाल में गंगासागर में स्नान के लिए लाखों श्रद्धालु पहुंचे। हालांकि कई जगहों पर स्थानीय प्रशासन ने कुछ सख्ती दिखाई। लेकिन मुश्किल तब ज्यादा खड़ी हो जाती है जब धार्मिक और राजनीतिक आयोजनों में भीड़ उमड़ती है और किसी को भी संक्रमण फैलने की चिंता नहीं रहती। कुछ दिन पहले तक हुई चुनावी रैलियां और सभाएं इसकी मिसाल हैं।

अच्छी बात यह है कि भारत में आबादी के बड़े हिस्से को टीके की एक खुराक लग चुकी है। दोनों खुराक वालों का आंकड़ा भी साठ करोड़ से ऊपर निकल गया है। बच्चों से लेकर बड़ों-बुजुर्गों तक को टीके लग रहे हैं। हालांकि समय-समय पर आने वाली ऐसी खबरें भी चिंता पैदा करती हैं कि कुछ राज्यों में टीकाकरण की रफ्तार संतोषजनक नहीं है।

इसलिए राज्यों को अब सबसे ज्यादा जोर टीकाकरण पर देना चाहिए। इसके अलावा संक्रमितों की जांच का काम भी नहीं हो रहा। टीकाकरण और जांच के काम स्थानीय स्तर पर अभियान के रूप में चलाना होगा। पर सबसे जरूरी है कि महामारी से निपटने में राज्यों और केंद्र के बीच भी तालमेल बेहतर बने, जिसका कि समय-समय पर अभाव दिखता रहा है। वरना हम इस जंग को जीत नहीं पाएंगे।

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