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किसान का जज्बा

किसान आंदोलन को चलते छह महीने पूरे हो गए। ऐसा संगठित और लंबे समय तक चलने वाला किसान आंदोलन पहली बार देखा जा रहा है। इस दौरान केंद्र सरकार ने किसान संगठनों से बातचीत करने का प्रयास भी किया, मगर दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिद पर अड़े रहे, जिसकी वजह से अब तक कोई व्यावहारिक रास्ता नहीं निकल सका है।

किसान नेताओं ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि वे बातचीत के लिए तैयार हैं लेकिन सरकार को एक बेहतर प्रस्ताव लेकर आना होगा (फोटो -इंडियन एक्सप्रेस)

इस वक्त जब सारा देश कोरोना महामारी के भय से घरों में दुबका बैठा है, प्रशासन इसके संक्रमण को रोकने के लिए लोगों को भीड़भाड़ से बचने की अपील कर रहा है, तब भी किसान अपने आंदोलन के मोर्चों पर डटे हुए हैं। इस आंदोलन को चलते छह महीने पूरे हो गए। ऐसा संगठित और लंबे समय तक चलने वाला किसान आंदोलन पहली बार देखा जा रहा है। इस दौरान केंद्र सरकार ने किसान संगठनों से बातचीत करने का प्रयास भी किया, मगर दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिद पर अड़े रहे, जिसकी वजह से अब तक कोई व्यावहारिक रास्ता नहीं निकल सका है।

दिल्ली के सभी प्रवेश द्वारों पर बैठे किसान इस बीच तरह-तरह से विरोध प्रदर्शन के आयोजन करते रहे। विशाल ट्रैक्टर रैली निकाल कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया, तो छब्बीस जनवरी को अलग से परेड भी निकाली, जिसमें लालकिले वाली अप्रिय घटना हो गई। मगर अब तक के उनके लगभग सारे कार्यक्रमों को शांतिपूर्ण तरीके से जनसमर्थन मिलता रहा। मौसम की मार और स्वास्थ्य कारणों के चलते कई सौ किसानों की जान भी चली गई। लेकिन आंदोलनकारी किसान डिगे नहीं। हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकारों ने उन पर शिकंजा कसने के खूब प्रयास किए, पर वे भी किसानों का मंसूबा तोड़ नहीं पाए। अब एक तरह से स्थायी बसेरा बना कर वे दिल्ली की सीमाओं पर जमे हुए हैं।

आंदोलन के छह महीने पूरे होने पर इस तारीख यानी छब्बीस मई को काला दिवस के रूप में मनाने की घोषणा संयुक्त किसान मोर्चे ने बहुत पहले कर दी थी। सरकारें भय दिखाती रहीं कि इस आयोजन में भीड़भाड़ बढ़ने से कोरोना की शृंखला तोड़ने में मुश्किल आएगी, किसानों के बड़े पैमाने पर संक्रमित होने की आशंका है। फिर भी देश के विभिन्न हिस्सों से किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर पहुंच कर अपना विरोध जताया। हरियाणा, पंजाब सहित कई राज्यों में किसानों ने अपने घरों के बाहर काले झंडे लगा कर इस आयोजन में अपनी शिरकत दर्शाई। इस तरह किसानों ने नए कृषि कानूनों के विरोध में एकजुटता प्रदर्शित कर सरकार को संदेश देने का प्रयास किया कि उसे उनकी मांगों पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। मगर लगता नहीं कि केंद्र सरकार पर इस प्रदर्शन का भी कोई असर पड़ने वाला है।

अभी तक सरकार की कोशिशें किसान आंदोलन को बलपूर्वक दबाने की ही अधिक देखी गई हैं। कभी कानूनों का भय दिखा कर, तो कभी उनका रास्ता रोक कर, कभी मुकदमे दर्ज करके, तो कभी कीलें और कंटीले तार ठोंक कर। मगर हर बार किसानों ने उसे अपने कदम वापस खींचने पर मजबूर ही किया है। हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों के गांवों में जनप्रतिनिधियों को वहां के लोगों की नाराजगी झेलनी पड़ रही है। फिर भी अगर सरकार इस मसले के समाधान के लिए गंभीरता से प्रयास नहीं कर रही, तो यह उसका अड़ियल रवैया ही कहलाएगा। हालांकि इन दिनों कोरोना महामारी की वजह से कुछ बाधाएं उपस्थित हैं, पर ऐसा नहीं कि किसान नेताओं से बातचीत के लिए वह रास्ता नहीं निकाल सकती।

किसी भी सरकार का अपने किसी फैसले पर इस तरह अड़े रहना उसके लिए मुश्किलें ही खड़ी करता है। किसानों के काला दिवस कार्यक्रम का तो ज्यादातर विपक्षी दलों ने भी समर्थन किया। ऐसे में सरकार के लिए परेशानियां और बढ़ती दिख रही हैं। अब तक उसे अंदाजा हो जाना चाहिए कि किसान आंदोलन के मामले में लचीला रुख अपना कर ही कोई समाधान निकाला जा सकता है। बातचीत का जो सिलसिला उसने बंद कर दिया था, उसे फिर से शुरू करने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए।

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