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आतंक के विरुद्ध

शुक्रवार को शोपियां और त्राल इलाके में अलग-अलग ठिकानों पर आतंकियों के बारे में खुफिया सूचना मिलने पर सुरक्षा बलों ने दबिश दी, तो उन पर हमला कर दिया गया। नतीजतन, मुठभेड़ की शुरुआत हुई और शोपियां में तीन और त्राल में दो आतंकियों को मार गिराया गया।

भारतीय सीमा में प्रवेश करने का प्रयास करते पाकिस्‍तानी आतंकी। फाइल फोटो।

जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर सुरक्षा बलों ने जिस तरह दो अलग-अलग मुठभेड़ों में सात आतंकियों को मार गिराया, उससे साफ है कि अब पहले के मुकाबले ज्यादा चौकसी बरते जाने की वजह से आतंकियों को रोकने में कामयाबी मिल रही है। लेकिन यह भी सच है कि तमाम चाक-चौबंद व्यवस्था के बावजूद जम्मू-कश्मीर में आतंकी संगठन सक्रिय हैं और मौका मिलते ही अपनी मंशा को पूरा करने की कोशिश करते हैं।

इस लिहाज से देखें तो निरंतर निगरानी सुरक्षा बलों की एक कारगर रणनीति साबित हुई है, जिसकी वजह से आतंकी संगठनों से जुड़े लोग अपनी गतिविधियों को अंजाम देने के पहले ही नजर में आ जाते हैं। कभी वे पकड़ लिए जाते हैं तो कई बार उनके हमले के जवाब में सुरक्षा बलों को मजबूरन उनसे मुठभेड़ करनी पड़ती है। शुक्रवार को शोपियां और त्राल इलाके में अलग-अलग ठिकानों पर आतंकियों के बारे में खुफिया सूचना मिलने पर सुरक्षा बलों ने दबिश दी, तो उन पर हमला कर दिया गया। नतीजतन, मुठभेड़ की शुरुआत हुई और शोपियां में तीन और त्राल में दो आतंकियों को मार गिराया गया।

निश्चित रूप से इस घटना को सुरक्षा बलों की एक बड़ी कामयाबी की तरह देख सकते हैं, लेकिन इससे यह भी जाहिर होता है कि उनकी चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। सच यह है कि आतंकवादी संगठनों ने जम्मू-कश्मीर के भीतरी इलाकों में अपनी पहुंच बनाए रखी है और मौका देख कर अपनी मंशा को अंजाम देने की कोशिश करते हैं या फिर सुरक्षा बलों पर हमला बोल देते हैं। मगर खास पहलू यह है कि पिछले कुछ सालों के दौरान जम्मू-कश्मीर की पुलिस, स्थानीय नागरिकों, खुफिया तंत्र के साथ सुरक्षा बलों के बीच बेहतर तालमेल कायम हुआ है। इसका फायदा यह हुआ कि अगर कहीं कोई संदिग्ध अपनी मंशा पर अमल करने की कोशिश करता है तो उससे पहले ही उसे रोकने, गिरफ्तार करने या हमला करने की स्थिति में मार गिराने में मदद मिलती है।

दूसरे, अब पहले की तरह आतंकवादी संगठनों को अपने समूह में शामिल होने के लिए लोग नहीं मिल पा रहे हैं। कहा जा सकता है कि स्थानीय लोगों के बीच आतंक के रास्ते के खमियाजे को लेकर समझ और जागरूकता बढ़ी है और वे इससे अलग अपनी जिंदगी सुकून के साथ बिताना चाहते हैं। आतंकवाद का रास्ता अख्तियार करने के बाद के जीवन और सुरक्षा बलों से टकराव के खतरे के बारे में उन्हें अंदाजा है।

दरअसल, थोड़े अंतराल के बाद आतंकी संगठनों की ओर से सुरक्षा बलों पर हमले सहित दूसरी हरकतें अपनी उपस्थिति बनाए रखने की कवायदें होती हैं। इसके जरिए वे इस तरह का संदेश देना चाहते हैं कि इलाके में सब सामान्य नहीं है। लेकिन जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद से समूचे क्षेत्र में जैसी सामान्य स्थिति देखी गई है, उससे उनकी निराशा और बढ़ी है। उनकी गतिविधियों के लिए मौके सिमटे हैं और जगहें कम हुई हैं। इसलिए अब उनके खिलाफ कार्रवाई में सुरक्षा बलों को थोड़ी सुविधा भी हुई है।

इसके बावजूद सीमा पार के संगठनों के सहयोग से चलने वाले आतंकी संगठनों को कम करके आंकने की जरूरत नहीं है। यह गाहे-बगाहे साबित होता रहा है कि पाकिस्तान सीमा के भीतर मौजूद ठिकानों से ऐसे संगठन अपनी आतंकवादी गतिविधियां संचालित करते रहे हैं। इसलिए सावधानी और चौकसी में निरंतरता वक्त की जरूरत है। देश के खुफिया तंत्र से लेकर सुरक्षा बलों की ओर से इसमें अब कोई कोताही नहीं बरती जा रही है और ताजा मुठभेड़ों में आतंकियों को मार गिराने की घटना को इसी आलोक में देखा जा सकता है।

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