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रिश्तों का नया दौर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल की बांग्लादेश यात्रा दोनों देशों के बीच रिश्तों के नए युग की शुरूआत है। भारत बांग्लादेश के विकास में हर तरह से मददगार पड़ोसी की भूमिका निभाता आया है, लेकिन अब जिस तेजी से क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा है, उसमें दोनों देशों के बीच प्रगाढ़ रिश्तों की […]

ढाका में भाषण देते हुए प्रधानमंत्री मोदी। फोटो- पीटीआई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल की बांग्लादेश यात्रा दोनों देशों के बीच रिश्तों के नए युग की शुरूआत है। भारत बांग्लादेश के विकास में हर तरह से मददगार पड़ोसी की भूमिका निभाता आया है, लेकिन अब जिस तेजी से क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा है, उसमें दोनों देशों के बीच प्रगाढ़ रिश्तों की जरूरत कहीं ज्यादा महसूस की जा रही है। फिर भारत ह्यपड़ोसी पहले की नीतिह्ण पर भी चल रहा है।

इसका प्रमाण यह है कि साल भर बाद प्रधानमंत्री ने अपने विदेश दौरे की शुरूआत बांग्लादेश से की। हालांकि दोनों देशों के बीच विवाद के मुद्दे भी कम नहीं रहे हैं, लेकिन अच्छी बात यह है कि अब दोनों पक्ष इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि कैसा भी विवाद हो, बातचीत और भाईचारे से ही उसका समाधान संभव है। प्रधानमंत्री की इस यात्रा का यही संदेश है। आज भारत के लिए जितना महत्त्वपूर्ण बांग्लादेश है, उससे कहीं ज्यादा बांग्लादेश भी भारत की अहमियत और क्षेत्रीय व वैश्विक राजनीति में उसकी भूमिका को समझ रहा है।

आज बांग्लादेश की छवि वह नहीं है जो करीब एक दशक पहले हुआ करती थी, महीनों चलने वाली देशव्यापी हड़तालें, हिंसा, राजनीतिक अस्थिरता, बेरोजगारी, कट्टरपंथी ताकतों का दबदबा इस मुल्क के पर्याय थे। पर वर्तमान बांग्लादेश आर्थिक विकास की दौड़ में झंडे गाड़ रहा है। तैयार कपड़ों के निर्यात में बड़ा मुकाम हासिल कर चुका है, उसके यहां प्रति व्यक्ति आय लगभग एक हजार नौ सौ डॉलर है। कोरोना काल में उसने अर्थव्यवस्था को चौपट होने से बचा लिया। ये खूबियां अब उसे एक समृद्ध राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर कर रही हैं। ऐसे में भारत के लिए बांग्लादेश में निवेश के बड़े मौके हैं।

इसका लाभ भारत को मिले, यह प्रयास होना चाहिए। प्रधानमंत्री के दौरे में भारत और बांग्लादेश के बीच स्वास्थ्य, रक्षा, सुरक्षा, ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में तो मिल कर काम करने पर बात हुई ही, अंतरिक्ष के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। द्विपक्षीय संबंधों का ऐसा बढ़ता दायरा एशियाई क्षेत्र के विकास में भी बड़ी भूमिका निभा सकता है। हालांकि पिछले कुछ सालों में चीन ने बांग्लादेश में गहरी पैठ बनाई है और बड़ी परियोजनाओं में निवेश किया है।

वह बांग्लादेश के बंदरगाहों तक पहुंच बना कर बंगाल की खाड़ी में अपनी ताकत बढ़ाने की रणनीति पर चल रहा है। बांग्लादेश में चीन की बढ़ती गतिविधियां भारत के लिए कम चिंता का विषय नहीं हैं। हालांकि बांग्लादेश चीन को लेकर सतर्क है। इस मामले में वह श्रीलंका से सबक ले चुका है, जिसे चीन ने भारी कर्ज में डुबो दिया और परियोजनाओं से हाथ खींच लिया। ऐसे में बांग्लादेश चीन और भारत के साथ संतुलन की रणनीति को ज्यादा प्राथमिकता देगा।

भारत और बांग्लादेश के बीच जो समस्याएं और विवाद हैं, वे ऐसे नहीं हैं जिनका समाधान न निकल सके। घुसपैठ और नदियों के जल बंटवारे को लेकर चल रहे विवाद ज्यादा परेशान करने वाले हैं। जहां तक घुसपैठ का सवाल है, बांग्लादेश भी अब मानने लगा है कि उसके यहां के नागरिक गैरकानूनी रूप से भारत में जाते रहे हैं। हालांकि एनआरसी को लेकर बांग्लादेश चिंता व्यक्त करता रहा है, लेकिन उसने इसे भारत का अंदरूनी मामला करार देते हुए कानूनी रूप से अपने नागरिकों को वापस लेने से इंकार नहीं किया है। दोनों ही देश आतंकवाद और रोहिंग्या शरणार्थियों की समस्या से त्रस्त हैं। ऐसे में दोनों देश सिर्फ आपसी समझ और व्यापक सहयोग के जरिए भविष्य में रिश्तों को नए आयाम दे सकते हैं।

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