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संपादकीय: जेल में हिंसा

विडंबना यह है कि जिन जेलों में साधारण से लेकर खूंखार कैदी तक को रखने की व्यवस्था होती है, वहां इस तरह के हंगामे से निपटने के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे। यही वजह है कि भारी पैमाने पर कैदियों की ओर से की गई हिंसा पर काबू पाने में जेल प्रशासन को करीब चार घंटे लग गए।

Author June 29, 2019 12:10 AM
लुधियाना जेल में कैदियों ने काफी बवाल किया था। (फोटो सोर्स-एएनआई वीडियो स्नैप शॉट)

लुधियाना के केंद्रीय कारागार में गुरुवार को जो हुआ, उससे एक बार फिर यही लगता है कि जिन जगहों को कैदियों को रखे जाने के लिहाज से सबसे संवेदनशील और सुरक्षित जगह माना जाता है, वहां निगरानी से लेकर बाकी सभी स्तरों पर किस तरह की लापरवाही बरती जा सकती है। गौरतलब है कि जेल में दो गुटों के बीच हिंसक टकराव में एक कैदी की मौत के बाद वहां बड़ी संख्या में मौजूद कैदियों के बीच आक्रोश फैल गया और वे अराजकता और हिंसा पर उतर आए। कैदियों ने जेल की कैसी हालत बना दी थी, उसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने जेल में कुछ पुलिसकर्मियों को बंदी बना लिया, उनके हथियार छीन लिए और पिटाई भी की। इसके बाद पता चलने पर जेल के अधिकारी और जवान अपने साथियों को छुड़वाने पहुंचे और इस दौरान ही कैदियों ने पुलिस पर फायरिंग और पत्थरबाजी शुरू कर दी और दस बैरकों को नुकसान पहुंचाया। सवाल है कि जिन जेलों को उच्च स्तर वाली सुरक्षा प्रणाली से लैस माना जाता है, उसकी चारदीवारी के भीतर इस तरह की अराजकता का माहौल कैसे बन गया! जेल प्रशासन का कैदियों पर जैसे कोई नियंत्रण ही नहीं रह गया था, इसीलिए कैदियों को उत्पात करने में उन्हें कोई असुविधा नहीं हुई।

विडंबना यह है कि जिन जेलों में साधारण से लेकर खूंखार कैदी तक को रखने की व्यवस्था होती है, वहां इस तरह के हंगामे से निपटने के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे। यही वजह है कि भारी पैमाने पर कैदियों की ओर से की गई हिंसा पर काबू पाने में जेल प्रशासन को करीब चार घंटे लग गए। हालत यह थी कि न केवल नब्बे राउंड गोलियां चलीं, बल्कि कैदियों ने समूची घटना का फेसबुक पर सीधा प्रसारण भी किया। अंदाजा लगाया जा सकता है कि बेलगाम कैदियों के सामने जेल की सुरक्षा व्यवस्था किस कदर लाचार थी और स्थिति पर नियंत्रण में अगर थोड़ी देर होती तो आक्रोशित कैदी और क्या कर सकते थे। यह एक सामान्य तथ्य है कि जेल में बंद ज्यादातर कैदी चूंकि आपराधिक पृष्ठभूमि के होते हैं, इसलिए उनका ऐसा रुख अख्तिायर कर लेना कोई हैरानी की बात नहीं है। लेकिन अगर ऐसे में उन्हें कोई बहाना मिल जाए तो इसके लिए किसकी जवाबदेही बनती है? आखिर जिस कैदी की मौत पर कैदियों के बीच आक्रोश फैला, वह स्थिति क्यों पैदा हुई और क्या उससे बचा नहीं जा सकता था?

जेलों में बंद कैदी सजा काट रहे हों या विचाराधीन हों, उन्हें एक अनुशासन में रखना जेल प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। इसके लिए सबसे ज्यादा इस बात का ध्यान रखने की जरूरत है कि सुरक्षा-व्यवस्था के पर्याप्त इंतजाम हों और उसमें कोई ढील नहीं हो। लेकिन जेलों में अव्यवस्था से लेकर ऐसी खबरें आम हैं कि जेलों के भीतर भी कैदियों को मोबाइल रखने या दूसरी कई तरह की सुविधाएं मिल जाती हैं। बिना जेलकर्मियों की मिलीभगत के या फिर घोर लापरवाही के ऐसा होना संभव नहीं होता। लेकिन इस क्रम में जिस तरह की अराजकता फैलती है, उससे सजा की प्रकृत्ति या जेल में रहने के नियम-कायदे एक तरह से बेमानी हो जाते हैं। लुधियाना जेल में अराजकता और हिंसा जैसे हालात पैदा होते हैं तो उसके लिए आखिर किसकी जवाबदेही बनती है? जेलों में सुरक्षा-व्यवस्था का पूरी तरह चौकस रहना केवल कैदियों पर नियंत्रण के लिहाज से नहीं, बल्कि कानून की हिफाजत के लिए भी जरूरी है। इसमें कोताही से समूची व्यवस्था पर सवाल उठता है।

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