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संपादकीय: उड़नपरी हिमा

हाल में पोलैंड और चेक गणराज्य में आयोजित एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं के तहत अलग-अलग दौड़ स्पर्धाओं में हिमा दास एक के बाद एक लगातार अव्वल नंबर पर आईं और छह स्वर्ण पदक जीते। हिमा ने दो सौ और चार सौ मीटर की दौड़ स्पर्धा में नए कीर्तिमान बनाए।

हिमा दास ने जीता चौथा गोल्ड मेडल

प्रतिभा का रास्ता कांटों भरा हो सकता है, कुछ समय तक के लिए बाधित दिख सकता है, लेकिन उसे अपने मुकाम तक पहुंचने से स्थायी तौर पर रोका नहीं जा सकता। महज इक्कीस दिनों के भीतर हिमा दास ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में छह स्वर्ण पदक हासिल कर यह साबित कर दिया है कि देश में प्रतिभाओं और क्षमताओं की कमी नहीं है। बस उन्हें वक्त पर थोड़ी दिशा मिल जाए तो खेलों की दुनिया में देश का नाम सोने की तरह चमकते अक्षरों में दिखेगा। हाल में पोलैंड और चेक गणराज्य में आयोजित एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं के तहत अलग-अलग दौड़ स्पर्धाओं में हिमा दास एक के बाद एक लगातार अव्वल नंबर पर आईं और छह स्वर्ण पदक जीते। हिमा ने दो सौ और चार सौ मीटर की दौड़ स्पर्धा में नए कीर्तिमान बनाए। यों किसी भी खिलाड़ी के इस तरह लगातार अव्वल आने पर दुनिया का ध्यान जाना लाजिमी है। यह बेवजह नहीं है कि भारत में न केवल शीर्ष स्तर के नेताओं और खिलाड़ियों ने हिमा दास को शुभकामना दी, बल्कि बाकायदा राज्यसभा की ओर से उनकी उपलब्धियों के लिए बधाई दी गई और उन्हें पूरे देश के खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बताया गया।

यह ध्यान रखने की जरूरत है कि आज देश में एक प्रेरणा के रूप में देखे जाने और यहां तक के सफर से पहले महज उन्नीस साल की हिमा दास का सफर कोई आसान नहीं रहा है। एक दौर था जब उनका परिवार इस स्तर के अभाव से जूझ रहा था कि हिमा के पास दौड़ने के लिए जूते तक नहीं थे। वे अपने स्कूल के दिनों में लड़कों की टीम में फुटबॉल खेलती थीं और अपना भविष्य इसी खेल में देख रही थीं। लेकिन एक शिक्षक की सलाह पर उन्होंने दौड़ना शुरू किया और बाद में अपने कोच की मदद से वे पहली अंतर-जिला स्तर की दौड़ प्रतियोगिताओं में हवा में उड़ने की तरह सबसे आगे रही थीं और इतनी कम उम्र में अपनी प्रतिभा से सबको चौंका रही थीं। उसी दौरान वे ‘ढिंग एक्सप्रेस’ के तौर पर मशहूर हो गईं। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी कुछ ही समय बाद अपनी धमक स्थापित कर दी। यह सही है कि अभी उन्हें लंबा सफर तय करना है, लेकिन आज वे दौड़ की दुनिया में एक सितारे की तरह चमक रही हैं तो बेशक यह उनकी मेहनत, लगन और क्षमताओं का हासिल है। लेकिन सच यह भी है कि उनके कोच निपोन ने उनकी प्रतिभा को वक्त पर पहचाना और जिद के तौर पर अपनी सीमा में उन्हें जरूरी प्रशिक्षण दिया।

हिमा के व्यक्तित्व की एक खूबसूरत खासियत यह है कि हाल में अपने प्रदर्शनों के बूते उन्हें जो आय हुई, उसका आधा उन्होंने अपने गृह-राज्य असम के बाढ़ पीड़ितों के लिए दे दिया। वे आज भी अपने पुराने अभाव के दिनों को याद करके भावुक हो जाती हैं। हमारे देश में यह विडंबना लंबे समय से बनी है कि दूरदराज के इलाकों में गरीब परिवारों के कई बच्चे अलग-अलग खेलोंं में अपनी बेहतरीन क्षमताओं के साथ स्थानीय स्तर पर तो किसी तरह उभर गए, लेकिन अवसरों और सुविधाओं के अभाव में उससे आगे नहीं बढ़ सके। लेकिन इसी बीच कई उदाहरण सामने आए, जिनमें जरा मौका हाथ आने पर उनमें से किसी ने दुनिया से अपना लोहा मनवा लिया। हिमा दास उन्हीं में से एक हैं, जिन्होंने बहुत कम वक्त के दौरान अपने दम से यह साबित कर दिया कि अगर वक्त पर प्रतिभाओं की पहचान हो, उन्हें मौका दिया जाए, थोड़ी सुविधा मिल जाए तो वे दुनिया भर में देश का नाम रोशन कर सकती हैं।

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