ताज़ा खबर
 

संपादकीय: अंधविश्वास की त्रासदी

झारखंड में हुई ये घटनाएं कोई नई नहीं हैं। ‘डायन’ होने के अंधविश्वास की वजह से इस तरह किसी को मार डाले जाने या मानव मल खिलाने के मामले अक्सर सामने आते रहे हैं।

Author July 24, 2019 12:57 AM

इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जिस दिन विज्ञान की दुनिया में ‘चंद्रयान-2’ के कामयाब प्रक्षेपण के रूप में देश ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की, उसी दौरान झारखंड से अंधविश्वास की वजह से चार लोगों को बर्बरता से मार डालने की परेशान करने वाली खबर आई। राज्य में गुमला जिले के सिसकारी गांव में दो महिलाओं सहित चार बुजुर्ग आदिवासियों को लोगों ने इसलिए पीट-पीट कर मार डाला कि किसी तांत्रिक या ओझा ने उन्हें ‘डायन’ बता दिया। इसके अलावा, पिछले हफ्ते झारखंड के ही गिरिडीह में दो महिलाओं सहित तीन लोगों को मानव मल खाने पर मजबूर किया गया। दोनों ही घटनाओं के सामने आने के बाद पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है। ऐसे मामलों के तूल पकड़ने के बाद इस तरह की कार्रवाइयां पहले भी होती रही हैं। सवाल है कि उनका हासिल क्या है? आमतौर पर ऐसी हर घटना के बाद कानून अपना काम करता है और आरोपियों को गिरफ्तार करके कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाती है। मुश्किल यह है कि सोच-समझ और मानसिकता में गहरे पैठी जड़ताओं से जुड़ी इस समस्या की मूल वजहों को दूर करने की कोशिश नहीं की जाती है।

झारखंड में हुई ये घटनाएं कोई नई नहीं हैं। ‘डायन’ होने के अंधविश्वास की वजह से इस तरह किसी को मार डाले जाने या मानव मल खिलाने के मामले अक्सर सामने आते रहे हैं। इस पर काबू पाने के मकसद से सख्त कानूनी प्रावधान भी किए गए, लेकिन आज भी अगर यह अंधविश्वास बदस्तूर कायम है तो यह न केवल कानून लागू करने वाली एजेंसियों की नाकामी है, बल्कि इससे यह भी साबित होता है कि विकास की चमकती तस्वीर में सामाजिक जड़ताओं की जंजीरों को तोड़ने के मुद्दे किस तरह दरकिनार हैं। सिसकारी गांव में कुछ लोगों की बीमारी की वजह से मौत हो गई थी। लोगों को लगा कि गांव को किसी की बुरी नजर लग गई है और इस मुद्दे पर बाकायदा एक सभा या पंचायत की बैठक की गई और किसी ओझा से संपर्क किया गया। फिर उसी की सलाह के बाद मामला यहां तक पहुंचा कि गांव वालों ने चार लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी। गिरिडीह में भी तीन लोगों को मानव मल खिलाने के पीछे ठीक इसी तरह का अंधविश्वास है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि इस तरह के अंधविश्वासों के बने रहने के पीछे मुख्य वजह अशिक्षा और गरीबी है। अभाव के बीच अशिक्षा की हालत में लोग इतना भी समझ पाने में सक्षम नहीं होते कि अगर कोई व्यक्ति बीमार है तो उसे डॉक्टर से इलाज कराने की जरूरत है। कई स्तर पर आधुनिक तकनीकी दूरदराज के इलाके में पहुंच जाती है, बदहाल स्कूलों में कभी किताब की शक्ल में शायद विज्ञान भी पढ़ा दिया जाता हो, लेकिन चेतना के स्तर पर लोगों की सोच में बदलाव लाने और वैज्ञानिक दृष्टि के विकास की कोई कोशिश नहीं होती। यह बेवजह नहीं है कि न केवल झारखंड या दूरदराज के इलाकों, बल्कि शहरों में भी ‘डायन’ या भूत-प्रेत जैसी अंधविश्वास पर आधारित धारणाएं लोगों के बीच जड़ें जमाए रहती हैं। यह वैज्ञानिक सोच के अभाव का ही नतीजा है कि स्थानीय स्तर पर ओझा-तांत्रिकों से लेकर बाबाओं का जाल फैला हुआ है और अंधविश्वास समाज के कमजोर तबकों के लिए त्रासदी साबित हो रहा है। सवाल है कि लंबे समय से इसके एक गंभीर समस्या के रूप में कायम रहने के बावजूद सरकार को इस पर काबू पाने के लिए ठोस और कुछ साहसपूर्ण कदम उठाने की जरूरत क्या इसलिए महसूस नहीं होती कि इन अंधविश्वासों की मार सहने और मरने वाले लोग समाज के बेहद कमजोर तबके से आते हैं?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App