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संपादकीय: आतंक का दायरा

आतंकियों का सामना करने के लिए सरकार ने हर स्तर पर चौकसी बरती और यही वजह है कि आज आतंकवादियों के हौसले कमजोर हुए हैं।

Author Published on: January 14, 2020 12:38 AM
क्या खुफिया सूचनाएं हासिल करने के इसी स्तर के बूते देश के सुरक्षा बल आतंकवाद से अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं? (फाइल फोटो)

जिस दौर में पूरी दुनिया एक व्यापक और जटिल आतंकवाद की समस्या से जूझ रही है, उसमें किसी ऐसे व्यक्ति को आतंकियों के साथी के रूप में गिरफ्तार किया जाता है, जिसे आतंकवादियों से निपटने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, तो यह समझा जा सकता है कि इस समस्या की चुनौती कितनी गहरी है। खासतौर पर भारत ने आतंकवाद की पीड़ा जिस स्तर तक झेली है, वह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन आतंकियों का सामना करने के लिए सरकार ने हर स्तर पर चौकसी बरती और यही वजह है कि आज आतंकवादियों के हौसले कमजोर हुए हैं। विडंबना यह है कि देश ने सुरक्षा व्यवस्था के तहत जिन लोगों को आतंकियों का सामना करने के लिए तैनात किया है, उनमें से ही कुछ लोग आतंकवादियों के साथी के तौर पर काम कर रहे थे।

हालांकि देश का सुरक्षा तंत्र फिलहाल इतना चौकस है कि इसमें न केवल आतंकियों, बल्कि प्रच्छन्न रूप से उनका साथ देने वाले भी पकड़ में आ जाते हैं। गौरतलब है कि सोमवार को आई एक खबर के मुताबिक दक्षिण कश्मीर के कुलगाम इलाके में खुफिया सूचना मिलने के बाद शुरू किए गए सुरक्षा अभियान के दौरान जम्मू-कश्मीर में तैनात पुलिस उपाधीक्षक रैंक के एक अधिकारी को हिजबुल मुजाहिदीन के दो आतंकवादियों के साथ गिरफ्तार किया गया। तीनों एक ही वाहन में पकड़े गए और आशंका है कि वे किसी आतंकी वारदात को अंजाम देने के मकसद से कहीं जा रहे थे।

इससे ज्यादा अफसोस की बात और क्या होगी कि जिस पुलिस अफसर को पिछले साल श्रेष्ठ सेवाओं के लिए राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया गया था, उसके आतंकवादियों के साथ मिले होने की बात सामने आई। बेशक अभी गहन जांच के बाद स्थितियां और स्पष्ट होंगी कि पकड़ा गया डीएसपी किस स्तर तक इस आरोप में सहभागी था, लेकिन इससे इतना तो साफ हुआ ही है कि जिस तंत्र के बूते हमारे देश में एक बड़ी चुनौती का सामना करने का दावा किया जा रहा है, उसके भीतर भी कई तरह के खतरे मौजूद हैं। यों जांच के दायरे में शायद सामने आया एक और तथ्य हो कि संसद पर हमले के लिए मौत की सजा पा चुके एक आतंकवादी ने अपनी चिट्ठी में इसी अफसर पर मिलीभगत की अंगुली उठाई थी। इसका बस अंदाजा भर लगाया जा सकता है कि एक ओर समूचे देश में आतंकी तत्त्वों से निपटने के लिए एक चौकस तंत्र का गठन किया जा रहा है, संसाधन झोंके जा रहे हैं, दूसरी ओर उसी तंत्र में बैठा कोई व्यक्ति आतंकवादियों का मददगार निकल आता है।

हालांकि यह बेहद अफसोसनाक स्थिति है और देश के सुरक्षा तंत्र में एक बड़ी कोताही का सबूत भी कि उच्च पद पर बैठा पुलिस अधिकारी खुद ही आतंकियों के साथ पकड़ा गया। निश्चित तौर पर यह किसी इक्का-दुक्का पुलिस अफसर के आतंकियों के साथी के तौर पकड़े जाने का मामला है और उम्मीद यही की जानी चाहिए कि सुरक्षा बलों में आज भी इतनी विश्वसीयता कायम है कि वे देश की सुरक्षा जैसे सबसे संवेदनशील मसले पर कोई चूक बर्दाश्त नहीं करेंगे। इसके बावजूद यह समझना मुश्किल है कि इतने समय तक यह अफसर खुद उस महकमे में उच्च पद पर कैसे बना रहा, जिसका काम ही आतंकवादियों का सामना करना और खुफिया सूचनाएं हासिल कर देश के अर्धसैनिक सुरक्षा बलों को प्रेषित करना है। आखिर उसके बारे में खुफिया तंत्र को कोई सूचना कैसे नहीं मिल सकी और कैसे वह इतने समय से ऐसे काम में लगा हुआ था? क्या खुफिया सूचनाएं हासिल करने के इसी स्तर के बूते देश के सुरक्षा बल आतंकवाद से अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं?

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