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संपादकीय: मितव्ययता के बरक्स

प्रधानमंत्री के उस सुझाव को बेमानी खर्चों से बचने की दिशा में एक स्वागतयोग्य पहल माना गया था। इसके बाद कुछ राज्यों में सरकारी कार्यक्रमों में फिजूलखर्ची पर रोक लगाने के मामले में प्रधामनंत्री के नक्शे-कदम पर चलने की घोषणा की गई थी। लेकिन आज भी हकीकत यह है कि जनप्रतिनिधियों के रहन-सहन, सरकारी आवास की साज-सज्जा से लेकर उनके निजी खर्चों की मदों में जिस तरह धन खर्च किया जाता है, उसे जायज ठहराना कई बार मुश्किल हो जाता है।

Author November 27, 2018 8:26 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PTI File Photo)

सरकारी धन की फिजूलखर्ची को लेकर जब भी सवाल उठते हैं तो सरकारों की ओर से ऐसे आदेश जारी किए जाते हैं कि जनप्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों के रहन-सहन से लेकर दूसरे तमाम मदों में खर्चों में कटौती की जाएगी। लेकिन ऐसे तमाम आश्वासन या आदेश आमतौर पर कुछ दिनों की चर्चा बन कर रह जाते हैं। यही वजह है कि आए दिन ऐसे मुद्दे बहस के केंद्र में होते हैं कि सरकार के किसी गैर-महत्त्व के कार्यक्रम पर किए जाने वाले खर्चों के पैसे से कितने जनोपयोगी काम पूरे कराए जा सकते हैं। दूसरी ओर, ऐसे मामले आम रहे हैं, जिनमें किसी काम के नहीं होने की वजह सरकारें धन की कमी को बताती रही हैं। लेकिन फिजूलखर्ची पर रोक लगाने का दावा करने वाली सरकारें इस मसले पर औपचारिक आश्वासन जारी करने से आगे शायद ही कभी कोई ठोस कदम उठाती हैं। उल्टे अक्सर ऐसी खबरें आती रहती हैं कि सांसदों या विधायकों या फिर अलग-अलग सरकारी महकमों में ऊंचे पदों पर आसीन अधिकारियों की सुविधा का खयाल रखने में बेतहाशा पैसे बहाए जाते हैं। अक्सर मितव्ययता बरतने के आदेशों या आग्रहों को ताक पर रख कर ऐसे कामों में भी खुले हाथों से पैसे बहाए जाते हैं, जिनकी बहुत जरूरत नहीं होती है।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने अपनी एक ताजा कवायद के तहत सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश और अन्य जजों, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के सरकारी बंगलों की साज-सज्जा के लिए मुहैया कराई जाने वाली राशि में सौ फीसद की बढ़ोतरी की है। खबरों के मुताबिक, मौजूदा प्रावधानों के तहत प्रधान न्यायाधीश को अपने सरकारी आवास की साज-सज्जा के लिए पांच लाख रुपए मिलते हैं, लेकिन अब उन्हें मिलने वाली वह राशि दोगुनी होगी। इसी तरह, सुप्रीम कोर्ट के अन्य जजों और सभी चुनाव आयुक्तों के सरकारी बंगलों के लिए भी केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने मौजूदा चार लाख रुपए की सीमा को बढ़ा कर आठ लाख रुपए कर दिया है। इस फैसले के तहत जिन बंगलों की साज-सज्जा के मद में सौ फीसद बढ़ोतरी की गई है, वे भवन पहले ही रखरखाव के मामले में आमतौर पर उच्च गुणवत्ता से युक्त होते हैं। यों अगर किसी भवन के रखरखाव या उसकी मरम्मत की जरूरत है तो निश्चित रूप से उसमें कमी नहीं की जानी चाहिए। लेकिन साज-सज्जा पर होने वाले खर्च हर स्थिति में अनिवार्य नहीं भी होते हैं।

प्रधानमंत्री ने अपने मौजूदा कार्यकाल के शुरुआती दौर में ही मंत्रिमंडल की बैठक में फिजूलखर्ची पर रोक लगाने के लिए हर संभव कदम उठाने की सलाह दी थी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि सरकारी बंगलों को सजाने-संवारने पर ज्यादा खर्च न करें। प्रधानमंत्री के उस सुझाव को बेमानी खर्चों से बचने की दिशा में एक स्वागतयोग्य पहल माना गया था। इसके बाद कुछ राज्यों में सरकारी कार्यक्रमों में फिजूलखर्ची पर रोक लगाने के मामले में प्रधामनंत्री के नक्शे-कदम पर चलने की घोषणा की गई थी। लेकिन आज भी हकीकत यह है कि जनप्रतिनिधियों के रहन-सहन, सरकारी आवास की साज-सज्जा से लेकर उनके निजी खर्चों की मदों में जिस तरह धन खर्च किया जाता है, उसे जायज ठहराना कई बार मुश्किल हो जाता है। जबकि ऐसी तमाम सरकारी योजनाएं होती हैं, जिनके समय पर पूरा नहीं होने के सवाल पर धन की कमी की दलील दी जाती है। ऐसे में अगर धन की उपलब्धता है तो क्या यह उचित नहीं है कि उसका प्राथमिक उपयोग आम जनता के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए लक्षित कामों में किया जाए?

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