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संपादकीय: बर्बादी का भोजन

विवाह समारोह पारिवारिक और नजदीकी रिश्तेदारों के बीच खुशी साझा करने, दो परिवारों के मिलन का मौका होता है मगर प्राय: लोग इसे अपनी हैसियत प्रदर्शित करने का मौका बना देते हैं। इसी के चलते वे जहां-जहां तक उनका संपर्क होता है, सबको न्योता भेज देते हैं। जिसका जितना बड़ा संपर्क-क्षेत्र है, वह उतने ही अधिक मेहमानों को आमंत्रित करता है। उसी के मुताबिक वह पंडाल और भोजन पर खर्च करता है। जिस समारोह में जितने अधिक मेहमान आते हैं, उसमें उतने ही अनुपात में भोजन की बर्बादी होती है।

Author Published on: December 13, 2018 4:55 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: Facebook/@FoodWastage)

शादी-विवाह के मौकों पर प्रदर्शनप्रियता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। महंगे पंडाल, भोजन की मेज पर हर प्रांत, हर देश के व्यंजन परोसने की होड़ हर कहीं दिखने लगी है। नतीजतन, शादियों में बड़ी मात्रा में भोजन की बर्बादी होती है। इस प्रवृत्ति पर लंबे समय से चिंता जताई और इस पर रोक लगाने की मांग उठती रही है। कई बार अदालतों ने भी शादियों में भोजन की बर्बादी रोकने के लिए कुछ व्यावहारिक उपाय करने के निर्देश दिए, पर इस दिशा में कोई उल्लेखनीय नतीजा नहीं निकल पाया है। हालांकि कुछ स्वयंसेवी संगठन शादियों और अन्य समारोहों में बचे हुए भोजन का प्रबंधन करते हैं। वे यह भोजन इकट्ठा कर गरीबों में वितरित करते हैं। पर उनकी भी सीमा है। हर समारोह से वे बचा हुआ भोजन नहीं उठा पाते। दिल्ली में कैटरर्स यानी भोजन संबंधी व्यवस्था संभालने वालों को स्पष्ट निर्देश है कि वे भोजन की बर्बादी रोकें। इसलिए कई कैटरर एक विवाह समारोह का बचा हुआ भोजन दूसरे समारोह में उपयोग कर लेते हैं। यह प्रवृत्ति भी अब एक समस्या बनती जा रही है। बासी भोजन खाने से लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ने की आशंका बनी रहती है। इसे देखते हुए दिल्ली सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को विवाह समारोहों में मेहमानों की संख्या सीमित रखने और भोजन की बर्बादी रोकने के लिए एक नीति बनाने का वचन दिया है।

विवाह समारोह पारिवारिक और नजदीकी रिश्तेदारों के बीच खुशी साझा करने, दो परिवारों के मिलन का मौका होता है मगर प्राय: लोग इसे अपनी हैसियत प्रदर्शित करने का मौका बना देते हैं। इसी के चलते वे जहां-जहां तक उनका संपर्क होता है, सबको न्योता भेज देते हैं। जिसका जितना बड़ा संपर्क-क्षेत्र है, वह उतने ही अधिक मेहमानों को आमंत्रित करता है। उसी के मुताबिक वह पंडाल और भोजन पर खर्च करता है। जिस समारोह में जितने अधिक मेहमान आते हैं, उसमें उतने ही अनुपात में भोजन की बर्बादी होती है। हालांकि कई मौकों पर अपील की जा चुकी है कि शादी-विवाह जैसे मौकों पर प्रदर्शनप्रियता से बाज आएं, पर लोग इस पर तार्किक ढंग से सोचना जरूरी नहीं समझते। यहां तक कि अन्न को देवता मानने, पंगत में बिठा कर जिमाने जैसी अपनी पुरानी मान्यताओं-परंपराओं से भी कुछ सीखना नहीं चाहते। पाकिस्तान जैसा देश इस मामले में हमसे ज्यादा सूझ-बूझ वाला नजर आता है। वहां विवाह समारोहों में सिर्फ एक भोजन परोसने का नियम है। कई व्यंजन परोसने पर वहां दंड का प्रावधान है। इस तरह उसने भोजन की बर्बादी पर अंकुश लगाया है।

अपने यहां सरकारें विवाह जैसे समारोहों में भोजन की बर्बादी पर रोक लगाने की दिशा में गंभीरता से सोच रही हैं, तो उनके सामने मुश्किलें आएंगी। इसलिए सबसे पहले लोगों में जागरूकता पैदा करने की कोशिश करनी पड़ेगी। उससे भी कितने लोगों में बदलाव आएगा, कहना मुश्किल है। इसलिए कैटरर्स की जवाबदेही तय करनी होगी। दिल्ली सरकार यही करने पर विचार कर रही है। वह कैटरिंग व्यवस्था को संस्थागत बनाने की सोच रही है। मगर इस तरह सिर्फ पंजीकृत कैटरर्स पर ही नकेल कसी जा सकेगी। बहुत सारे दिहाड़ी पर काम करने वाले कैटरर को कैसे जवाबदेह बनाया जा सकेगा? जब तक लोगों में यह भावना पैदा नहीं होगी कि विवाह समारोह खुशी का मौका होता है, अन्न की बर्बादी और इस तरह बहुत सारे भूखे लोगों का उपहास उड़ाने का नहीं, तब तक इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगना कठिन बना रहेगा।

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