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संपादकीय: सुरक्षा और सवाल

पिछले दस साल में भारत में जिस पुख्ता सुरक्षा की जरूरत महसूस की जाती रही है, उस पर हासिल संतोषजनक नहीं रहा है। उपलब्धि के नाम पर देश में राष्ट्रीय जांच एजंसी (एनआइए) का गठन हुआ। आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों की जांच इसके गठन का मकसद था और कई मामलों में यह एजंसी सफल भी हुई। तटीय सुरक्षा को दुरुस्त किया गया। लेकिन राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) बनाने की योजना राज्यों के विरोध के कारण आज तक परवान नहीं चढ़ सकी, जबकि यह सबसे जरूरी था।

Author November 27, 2018 3:44 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PTI File Photo)

मुंबई हमले की त्रासद घटना को दस साल बीत चुके हैं। यों तो भारत कश्मीर में आतंकवाद की मार झेल ही रहा था, लेकिन 26 नवंबर, 2008 को देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को आतंकवादियों ने जिस तरह निशाना बनाया, वह अकल्पनीय था। पाकिस्तान ऐसी दुश्मनी निभाएगा, किसी ने सोचा भी नहीं होगा। लश्कर-ए-तैयबा के सरगना हाफिज सईद ने इस हमले की साजिश रची थी और समुद्री रास्ते आतंकवादियों को भेज कर हमले को अंजाम दिया था। बहत्तर घंटे आतंकियों के साथ चली लड़ाई में एक सौ अस्सी से ज्यादा लोग मारे गए, बाईस विदेशी नागरिकों की भी इस हमले में जान चली गई और सत्रह सुरक्षाकर्मी शहीद हुए। घायलों का आंकड़ा तो तीन सौ के पार था। अरबों की संपत्ति खाक हुई। भारत ही नहीं, दुनिया को हिला देने वाले इस हमले ने अमेरिका पर हुए 9/11 के आतंकी हमले की याद ताजा करा दी थी। इसी के बाद यह हकीकत सामने आई कि हमारी सुरक्षा-व्यवस्था का आलम क्या है। भारत ने ऐसा हमला पहली बार झेला था, इसलिए आतंकियों से निपटने की रणनीति बनाने में देर हुई और तब तक हमलावरों को तबाही मचाने का काफी मौका मिल चुका था।

तब मुंबई हमले से हमारे खुफिया तंत्र की भी कमजोरी सामने आई थी। यह भी पता चला कि सरकारी एजेंसियों में तालमेल की किस कदर कमी थी, जिसकी वजह से मौके पर सुरक्षा बलों को पहुंचाने में घंटों निकल गए थे और तब तक मुंबई पुलिस के जवान ही मोर्चा संभालते रहे। जबकि अमेरिका पर हुए आतंकी हमले के बाद दुनिया के ज्यादातर देशों ने अपनी सुरक्षा को मजबूत करने और ऐसे हमलों से निपटने की रणनीति पर तत्काल काम शुरू कर दिया था। हमले के बाद अमेरिका ने अपनी सुरक्षा को अभेद्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और उसी का नतीजा है कि फिर कभी अमेरिका पर आतंकी हमला नहीं हुआ। इसके ठीक उलट, मुंबई हमले के बाद भी पाकिस्तान में पल रहे आतंकी संगठनों ने भारत में सैन्य ठिकानों पर एक बार नहीं, कई बार हमले कर अपनी मौजूदगी का अहसास कराया। हालांकि इससे पहले भारत 2001 में भी संसद पर हमले की मार झेल चुका था, पर तब सुरक्षा के मोर्चे पर ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे आतंकी दुबारा दुस्साहस नहीं कर पाते।

पिछले दस साल में भारत में जिस पुख्ता सुरक्षा की जरूरत महसूस की जाती रही है, उस पर हासिल संतोषजनक नहीं रहा है। उपलब्धि के नाम पर देश में राष्ट्रीय जांच एजंसी (एनआइए) का गठन हुआ। आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों की जांच इसके गठन का मकसद था और कई मामलों में यह एजंसी सफल भी हुई। तटीय सुरक्षा को दुरुस्त किया गया। लेकिन राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) बनाने की योजना राज्यों के विरोध के कारण आज तक परवान नहीं चढ़ सकी, जबकि यह सबसे जरूरी था। ऐसे में सवाल उठता है कि आतंकवाद और देश की सुरक्षा जैसे अत्यंत संवेदनशील मुद्दे पर भी हम अब तक उलझे क्यों हैं? कश्मीर में नेपाल के रास्ते आतंकी घुसपैठ जारी है। पंजाब से लेकर दिल्ली तक में आतंकियों के होने की खबरें हैं। इसका मतलब है कि मुंबई हमले के दस साल बाद भी हमारे कोताही भरे रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है। अमेरिका से सीखना चाहिए कि कैसे उसने हमले के सूत्रधार और अलकायदा सरगना उसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में घुस कर खत्म किया। जबकि मुंबई हमले का साजिशकर्ता हाफिज सईद पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहा है। जाहिर है, अमेरिका के पास ताकत से भी ज्यादा राजनीतिक इच्छाशक्ति थी, जो भारत के पास नहीं दिखती!

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