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संपादकीय: इलाज बनाम कमाई

यह किसी से छिपा नहीं है कि ज्यादातर बीमारियों के इलाज के लिए निजी अस्पताल किस तरह बेलगाम पैसा वसूलते रहे हैं। खासतौर पर स्वास्थ्य बीमा धारक मरीजों के इलाज का खर्च निर्धारित शुल्क या अपेक्षा से कई गुना ज्यादा देखा जाता है। इससे इतर, कई बार कुछ मरीजों के परिजन अगर किन्हीं वजहों से अस्पताल का बिल चुकाने में असमर्थ होते हैं तो वहां उनके साथ कैसा बर्ताव किया जाता है, उसकी खबरें भी आती रहती हैं।

Author December 4, 2018 5:16 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

किसी भी बीमारी के इलाज पर होने वाले खर्च को लेकर निजी अस्पतालों के रवैये पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। लेकिन अब तक कोई ऐसा तंत्र नहीं बनाया जा सका है, जिसके तहत बीमारी, इलाज और उस पर होने वाले खर्च को लेकर कोई नियम-कायदा तय हो। यही वजह है कि निजी अस्पताल और उसके डॉक्टर रोग की गंभीरता का हवाला देकर मरीजों और उनके परिजनों के सामने इलाज और खर्च का एक खौफ बना देते हैं। तत्काल इलाज की अनिवार्यता की हालत में ज्यादातर लोग अस्पताल-प्रबंधन या डॉक्टर के कहे मुताबिक ही करते हैं। दूसरी बीमारियों के अलावा गर्भवती स्त्रियों का प्रसव एक ऐसी ही अनिवार्यता है, जिसमें आजकल डॉक्टर आमतौर पर आॅपरेशन के जरिए ही बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया को प्राथमिक बताते हैं। इसकी जड़ में जितनी जरूरत आॅपरेशन की होती है, उससे ज्यादा डॉक्टर और अस्पताल इसे पैसा कमाने का जरिया बना लेते हैं। ये बातें साधारण लोगों को भी समझ में आने लगी हैं, लेकिन अमदाबाद स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान की ओर से किए गए एक अध्ययन में यह तथ्य साफ तौर पर सामने आया है कि भारत में निजी अस्पतालों में लाखों की तादाद में प्रसव के लिए सीजेरियन सेक्शन या फिर आॅपरेशन का सहारा लिया गया, जिससे बचा जा सकता था।

अध्ययन के मुताबिक चिकित्सीय रूप अनुचित इस तरह जन्म से न केवल लोगों को जरूरत से ज्यादा खर्च करना पड़ा, बल्कि इससे नवजातों को स्तनपान कराने में भी देरी हुई, शिशु का वजन कम हुआ, सांस लेने में तकलीफ हुई और इसके अलावा उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा। ऐसे मामले इक्का-दुक्का नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में सामने आए हैं। निजी अस्पतालों में महज साल भर में नौ लाख महिलाओं का प्रसव बगैर पूर्व योजना के सी-सेक्शन यानी सीजेरियन सेक्शन के जरिए किया गया, जिससे बचा जा सकता था और सामान्य प्राकृतिक प्रसव कराए जा सकते थे। इससे पहले 2015-16 में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अध्ययन में भी यह पाया गया था कि निजी अस्पतालों में करीब इकतालीस फीसद प्रसव सी-सेक्शन के जरिए हुए, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह दर काफी कम लगभग बारह फीसद रही। अंदाजा लगाया जा सकता है कि निजी अस्पताल या क्लिनिक चलाने वाले या उनमें काम करने वाले डॉक्टरों के लिए किसी मरीज का इलाज प्राथमिक है या उनकी स्थिति का फायदा उठा कर बेलगाम कमाई!

यह किसी से छिपा नहीं है कि ज्यादातर बीमारियों के इलाज के लिए निजी अस्पताल किस तरह बेलगाम पैसा वसूलते रहे हैं। खासतौर पर स्वास्थ्य बीमा धारक मरीजों के इलाज का खर्च निर्धारित शुल्क या अपेक्षा से कई गुना ज्यादा देखा जाता है। इससे इतर, कई बार कुछ मरीजों के परिजन अगर किन्हीं वजहों से अस्पताल का बिल चुकाने में असमर्थ होते हैं तो वहां उनके साथ कैसा बर्ताव किया जाता है, उसकी खबरें भी आती रहती हैं। जहां तक सी-सेक्शन के जरिए प्रसव का सवाल है, अनेक डॉक्टरों की इस बारे में साफ राय रही है कि गर्भावस्था में कुछ खास और जटिल परिस्थितियां पैदा हो जाने को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर प्रसव को सामान्य या प्राकृतिक तरीके से कराया जा सकता है। इसका नवजात और उसकी मां की सेहत पर भी अनुकूल असर पड़ता है। लेकिन जब डॉक्टर या अस्पताल का मकसद मरीज की सेहत का खयाल रखने से ज्यादा पैसा कमाना हो जाए तो ऐसे में चिकित्सकीय नैतिकता के सवाल ताक पर रख दिए जाते हैं। जरूरत इस बात की है कि स्वास्थ्य मंत्रालय और भारतीय चिकित्सा परिषद की ओर से इस मसले पर एक ठोस दिशा-निर्देश जारी हो और चिकित्सक पैसे के बजाय किसी मरीज का खयाल रखने को प्राथमिकता दें।

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