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संपादकीय: पाक को दो-टूक

हैरान करने वाली दूसरी बड़ी बात उद्घाटन के मौके पर इमरान खान के साथ खालिस्तानी नेता गोपाल चावला की मौजूदगी है। गोपाल चावला खालिस्तानी आतंकी है और मुंबई हमले के सूत्रधार हाफिज सईद का करीबी है। जाहिर है, वह इस समारोह में बिना पाकिस्तान सरकार की इजाजत के तो नहीं पहुंचा होगा। इसी समारोह में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष भी मौजूद थे। क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि इस मौके पर एक खालिस्तानी आतंकी को न्योता देकर पाकिस्तान ने भारत को यह संदेश देने की कोशिश की है कि उसके पास खालिस्तान नाम का हथियार अभी भी मौजूद है, जो पंजाब में फिर से अशांति फैला सकता है?

Author November 30, 2018 5:32 AM
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान। (फाइल फोटो, सोर्स: रॉयटर्स)

भारत ने पाकिस्तान को दो-टूक संदेश दे दिया है कि जब तक वह आतंकी हरकतें बंद नहीं करता, तब तक न तो दोनों देशों के बीच कोई बातचीत संभव है, न ही भारत दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) सम्मेलन में हिस्सा लेगा। भारत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि उसके इस सख्त रुख का करतारपुर साहिब के लिए रास्ते खोलने के कदम से कोई लेना-देना नहीं है। भारत को ऐसा कड़ा रुख दिखाने की जरूरत इसलिए पड़ी कि पाकिस्तान ने अपने यहां करतापुर साहिब गलियारे का उद्घाटन करके ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की, ताकि दुनियाभर में यह संदेश जाए कि पाकिस्तान शांति चाहता है, सारे मुद्दे हल करना चाहता है, केवल वही भाईचारे की बात करता है, उसकी कहीं कोई गलती नहीं है और जो कुछ समस्या है वह भारत की ओर से है! हालांकि करतारपुर साहिब का रास्ता खोलने की दिशा में कदम उठा कर पाकिस्तान ने सदाशयता का परिचय दिया है, लेकिन इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि दोनों देशों के बीच कई महत्त्वपूर्ण मुद्दों को लेकर लंबे समय से जो विवाद चले आ रहे हैं, उनका समाधान अपनी जगह है और उन्हें करतारपुर से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता।

करतारपुर साहिब तक पहुंच बनाने के लिए जो कदम उठाए गए हैं, उनसे यह धारणा बनने लगी थी कि पिछले कुछ सालों से दोनों देशों के रिश्तों में जमी बर्फ पिघलनी शुरू होगी। राजनयिक हलकों में इसे सकारात्मक कदम के रूप में देखा गया। लेकिन बुधवार को पाकिस्तान में इस गलियारे के उद्घाटन के मौके पर जो कुछ देखने-सुनने को मिला, वह भारत के लिए आघात पहुंचाने वाला रहा। इससे इन उम्मीदों पर पानी फिर गया कि पाकिस्तान के रुख में कोई सकारात्मक बदलाव आएगा। इस मौके पर अपने भाषण में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कश्मीर मुद्दा उठाते हुए कहा- ‘हमारा मसला सिर्फ कश्मीर का है। इंसान चांद पर पहुंच चुका है, लेकिन हम एक मसला हल नहीं कर पा रहे हैं।’ उनका यह कहना इसलिए ज्यादा खटकने वाला है कि यह अवसर कश्मीर मुद्दा उठाने का नहीं था। पाकिस्तान की शुरू से यह फितरत रही है कि वह जहां-तहां, जब-तब कश्मीर के अलावा कोई बात नहीं करता। जबकि पूरी दुनिया इस हकीकत को अच्छी तरह जानती-समझती है कि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और पाकिस्तान ने कश्मीर के एक हिस्से को दबा रखा है।

हैरान करने वाली दूसरी बड़ी बात उद्घाटन के मौके पर इमरान खान के साथ खालिस्तानी नेता गोपाल चावला की मौजूदगी है। गोपाल चावला खालिस्तानी आतंकी है और मुंबई हमले के सूत्रधार हाफिज सईद का करीबी है। जाहिर है, वह इस समारोह में बिना पाकिस्तान सरकार की इजाजत के तो नहीं पहुंचा होगा। इसी समारोह में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष भी मौजूद थे। क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि इस मौके पर एक खालिस्तानी आतंकी को न्योता देकर पाकिस्तान ने भारत को यह संदेश देने की कोशिश की है कि उसके पास खालिस्तान नाम का हथियार अभी भी मौजूद है, जो पंजाब में फिर से अशांति फैला सकता है? साफ है, पाकिस्तानी सेना, सरकार और आतंकी संगठनों के सरगना के तार आपस में मिले लगते हैं। भारत ने कभी दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो उसके जवाब पाकिस्तान ने कभी करगिल युद्ध, उड़ी और पठानकोट हमले के रूप में दिए। इसलिए आज जब इमरान खान बर्लिन की दीवार गिरने और जर्मनी के एकीकरण की तरह ही भारत-पाक दोस्ती का जुमला पढ़ रहे हैं तो उनकी नीयत पर संदेह होता है। पाकिस्तान को पहले अपने गिरेबां में झाकना होगा कि दोस्ती और सदाशयता की आड़ में उसने भारत को क्या दिया है।

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