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संपादकीय: किसान का दुख

किसान और किसानी की उपेक्षा हर सरकार करती रही है। उन्हें बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने, फसलों की उचित कीमत दिलाने के लिए कोई व्यावहारिक नीति नहीं बनाई गई। इस वजह से खेती अब न सिर्फ घाटे का सौदा बन गई है, बल्कि इस पर निर्भर रहने वाले किसान खुदकुशी करने को विवश हो रहे हैं। अब तक तीन लाख से ऊपर किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इसलिए किसानों के सब्र का बांध टूट रहा है और वे सरकार के सामने अपनी बात रखने दिल्ली पहुंचे।

Author December 1, 2018 5:40 AM
शुक्रवार (30 नवंबर) को दिल्ली में किसान मुक्ति मार्च में शामिल एक किसान। (फोटो – पीटीआई)

एक बार फिर देश भर से दिल्ली पहुंचे किसानों ने अपना दर्द बयान करने की कोशिश की। पिछले डेढ़ सालों में यह चौथी बार था, जब देश भर से किसान दिल्ली पहुंचे। इसमें दो सौ से ऊपर किसान संगठनों ने हिस्सा लिया। इसके पहले उन्हें दिल्ली की सीमा के बाहर ही रोक दिया गया था। किसानों का संसद तक पहुंचना एक प्रकार से प्रतीकात्मक है। पिछले कई सालों से देश के अलग-अलग हिस्सों में किसानों के आंदोलन चलते रहे हैं। इसी साल महाराष्ट्र में हजारों किसान मुंबई पहुंचे थे। मध्यप्रदेश के किसानों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए कई दिन तक दूध-फल-सब्जियां सड़कों पर फेंकी थी। किसानों की प्रमुख मांग है कि संसद का विशेष सत्र बुला कर कर्जमाफी और फसलों की लागत से डेढ़ गुना कीमत देने का कानून पारित किया जाए। किसान और किसानी की उपेक्षा हर सरकार करती रही है। उन्हें बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने, फसलों की उचित कीमत दिलाने के लिए कोई व्यावहारिक नीति नहीं बनाई गई। इस वजह से खेती अब न सिर्फ घाटे का सौदा बन गई है, बल्कि इस पर निर्भर रहने वाले किसान खुदकुशी करने को विवश हो रहे हैं। अब तक तीन लाख से ऊपर किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इसलिए किसानों के सब्र का बांध टूट रहा है और वे सरकार के सामने अपनी बात रखने दिल्ली पहुंचे।

सभी किसान संगठनों की मांग है कि स्वामिनाथन समिति की सिफारिशों को पूरी तरह लागू किया जाए। इसमें फसलों की लागत से डेढ़ गुना कीमत तय करने की सिफारिश प्रमुख है। कुछ लोगों का तर्क है कि कर्जमाफी खेती की दशा सुधारने का अंतिम उपाय नहीं हो सकता। पर जिस तरह किसान इस बोझ से दब चुके हैं, उसमें उन्हें मुक्ति दिलाने का और कोई तरीका नहीं हो सकता। अगर सिर्फ फसलों की कीमत बढ़ा भी दी जाएगी, तो उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा कर्ज उतारने में चला जाएगा। इसलिए कर्जमाफी और कीमत निर्धारण दोनों पक्षों पर व्यावहारिक निर्णय हो, तभी किसानों की दशा में सुधार की सूरत बन सकती है। इसके बाद दूसरे पक्षों पर भी संजीदगी से काम करने की जरूरत बनी रहेगी, जो कि किसानी की बुनियादी समस्याएं हैं। अभी तक सरकारें फसल बीमा, न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी जैसे छोटे-छोटे कदम उठा कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेती रही हैं, पर इसका कोई सकारात्मक हल नहीं निकल पाया है। इसलिए स्वाभाविक ही इस दिशा में व्यावहारिक कदम उठाने की मांग जोर पकड़ी है।

हमारे देश की करीब पैंसठ फीसद आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है। सकल घरेलू उत्पाद पर इस क्षेत्र का योगदान बड़ा प्रभाव डालता है। मगर हकीकत यह है कि किसानों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। वे या तो मौसम के मिजाज पर निर्भर हैं या कृषि उद्यमियों और साहूकारों के चंगुल में फंसे हुए हैं। इन स्थितियों से उन्हें तभी उबारा जा सकता है, जब कृषि क्षेत्र के लिए ठोस और व्यावहारिक नीति बने। सिंचाई से लेकर विपणन, भंडारण तक के पुख्ता इंतजाम हों। कारपोरेट कंपनियों को इस क्षेत्र में घुसपैठ और बाजार भाव तय करने के खेल से दूर रखा जाए। इसके साथ ही कृषि उत्पाद के आयात और निर्यात को संतुलित बनाया जाए। ऐसा न हो कि जिस फसल का उत्पादन अधिक हुआ हो उसका आयात किया जाए और जिसकी पैदावार कम हुई है उसका निर्यात किया जाए। इससे बाजार में असंतुलन पैदा होता है। देखना है, किसानों की मांग पर सरकार कितनी गंभीरता दिखाती है।

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