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संपादकीय: जेल में मौज

हालत यह है कि इस तरह की अवैध हरकतों पर सख्ती बरतने के बजाय मामले के सामने आने के बाद जेल प्रशासन ने अपना दामन बचाने के लिए कोतवाली में दी गई तहरीर में जेल में महज कुछ मोबाइल और एक सिम मिलने की बात कही। जबकि बैरक में कारतूस और पिस्तौल का जिक्र नहीं किया गया।

Author November 30, 2018 5:39 AM
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ( फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव)।

ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहे हैं जिनमें सजायाफ्ता कैदियों को जेलों में गैरकानूनी तरीके से अनेक ऐसी सुविधाएं भी मुहैया कराई जाती हैं, जो अपराध के दायरे में आती हैं। अगर कभी इसमें लिप्त लोग पकड़े जाते हैं तो तात्कालिक कार्रवाई के रूप में निलंबन जैसी औपचारिकता निभाई जाती है, लेकिन शायद ही कभी ऐसी व्यवस्था की जाती है जिसमें ऐसे मामले दोहराए न जा सकें। ताजा मामला उत्तर प्रदेश की रायबरेली जिला जेल से सामने आया है, जिसमें कैदियों ने अवैध रूप से न केवल शराब और चिकन जैसी खाने-पीने की चीजें मंगवार्इं, बल्कि उनके लिए असलहा और कारतूस भी साथ में लाया गया था। कई कैदियों ने वहां पार्टी की और मौज-मस्ती करते दिखे। यही नहीं, एक अपराधी बाकायदा मोबाइल से किसी को धमकी देते और अपने साथी से डिप्टी जेलर को पांच हजार रुपए देने की बात कर रहा था। सवाल है कि अगर लूट और हत्या जैसे गंभीर अपराधों को अंजाम देने वाले अपराधियों को जेल में भी मौज-मस्ती और अपनी आपराधिक गतिविधियां चलाने में कोई बाधा नहीं आती है तो आखिर उन्हें ये सुविधाएं किस कानून के तहत मुहैया कराई जाती हैं। हो सकता यह सब वहां लंबे समय से चल रहा हो। लेकिन इस बार धोखे से किसी तरह इस घटना का वीडियो बाहर आ गया वरना शायद सब कुछ पहले की तरह चलता रहता।

उस वीडियो के चारों तरफ फैल जाने के बाद असहज स्थिति में पड़े जेल अधीक्षक सहित छह अधिकारियों को निलंबित और संबंधित कैदियों को दूसरे कारागार में स्थानांतरित कर दिया गया। लेकिन क्या यह जेल प्रशासन के साथ-साथ सरकार के लिए भी शर्मिंदा होने का मामला नहीं है कि जिन अपराधियों को जेलों में सजा काटने के लिए रखा जाता है, वहां के अधिकारी ही उनके लिए सेवा और सुविधा का जरिया बन जाते हैं? हालत यह है कि इस तरह की अवैध हरकतों पर सख्ती बरतने के बजाय मामले के सामने आने के बाद जेल प्रशासन ने अपना दामन बचाने के लिए कोतवाली में दी गई तहरीर में जेल में महज कुछ मोबाइल और एक सिम मिलने की बात कही। जबकि बैरक में कारतूस और पिस्तौल का जिक्र नहीं किया गया। अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर वायरल हुए वीडियो में हकीकत दर्ज नहीं होती तो जेल अधिकारी और किस तरह से मामले को दबाने की कोशिश करते।

हालांकि यह कोई पहली घटना नहीं है जब जेल में सजा काट रहे अपराधियों को इस तरह की सुविधा मिलने की बात सामने आई हो। देश भर में जेलों में बंद कैदियों को रहन-सहन और खान-पान से लेकर टीवी या मोबाइल जैसी सुविधाएं अवैध तरीके से मुहैया कराए जाने की खबरें आती रही हैं। जाहिर है, ये सुविधाएं वैसे कैदियों को मिल पाती हैं जिनकी ऊंची राजनीतिक पहुंच होती है या फिर अपराध की दुनिया में उनका खौफ होता है। दूसरी ओर, ऐसी शिकायतें भी आम रही हैं जिनमें आम कैदियों के लिए निर्धारित गुणवत्ता वाली खाने-पीने की चीजों से लेकर सबसे जरूरी चीजें भी उपलब्ध नहीं कराई जाती हैं। जेलों के अधिकारी जहां रसूखदार कैदियों का खयाल रखे जाने के इंतजाम में लिप्त पाए जाते हैं, वहीं जेलों में दूसरे कमजोर कैदियों के मानवाधिकारों तक के हनन की खबरें आती रहती हैं। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि अगर अदालत की ओर से सजा सुनिश्चित करने के लिए कैदियों को जेलों में भेजा जाता है तो वहां का प्रशासन अदालती फैसलों पर अमल में लापरवाही बरतने और कुछ खास कैदियों को अवांछित गतिविधियां करने देने छूट कहां से हासिल करता है?

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