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संपादकीय: कामयाबी की उड़ान

जीसैट-11 संचार उपग्रह है और इसका उपयोग इंटरनेट की रफ्तार बढ़ाने में होगा। यह अत्याधुनिक और अगली पीढ़ी का संचार उपग्रह है और पंद्रह साल से ज्यादा समय तक काम करेगा। पांच हजार आठ सौ चौवन किलोग्राम वजन वाला जीसैट-11 इसरो द्वारा बनाया गया अब तक का सबसे भारी उपग्रह है। सबसे बड़ी कामयाबी यह रही कि उपग्रह धरती से छत्तीस हजार किलोमीटर ऊपर भूस्थिर कक्षा में बिना किसी बाधा के स्थापित कर दिया गया।

Author December 6, 2018 3:37 PM
इसरो के मुताबिक, इस सैटेलाइट के जरिए भारत में ब्रॉडबैंड सेवा और बेहतर बनाई जा सकेगी। (फोटोः टि्वटर/@isro)

भारत ने बुधवार को अब तक के अपने सबसे भारी उपग्रह जीसैट-11 को कक्षा में स्थापित कर अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक और बड़ी कामयाबी हासिल कर ली। इस उपग्रह को फ्रैंच गुयाना स्थित कोरू अंतरिक्ष केंद्र से एरियनस्पेस रॉकेट से छोड़ा गया। वैसे भारत अपने तमाम उपग्रह अपने ही प्रक्षेपण यानों और अंतरिक्ष केंद्रों से छोड़ता आया है। इतना ही नहीं, दूसरे देशों के उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करने और एक बार में कई उपग्रह कक्षा में स्थापित करने जैसी उपलब्धियां भारत के खाते में पहले ही दर्ज हो चुकी हैं। अंतरिक्ष के इस कारोबार में बड़ी सफलता इस साल बारह जनवरी को तब मिली थी जब श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी यानी पोलर सेटेलाइट लांच वीकल से भारत ने अपने तीन उपग्रह तो छोड़े ही थे, साथ में छह देशों- कनाडा, फिनलैंड, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और अमेरिका के भी अट्ठाइस उपग्रह अंतरिक्ष में पहुंचाए। अंतरिक्ष के क्षेत्र में वह मील का पत्थर इसलिए भी था कि इसरो ने इसी दिन अपना सौवां उपग्रह छोड़ा था।

जीसैट-11 संचार उपग्रह है और इसका उपयोग इंटरनेट की रफ्तार बढ़ाने में होगा। यह अत्याधुनिक और अगली पीढ़ी का संचार उपग्रह है और पंद्रह साल से ज्यादा समय तक काम करेगा। पांच हजार आठ सौ चौवन किलोग्राम वजन वाला जीसैट-11 इसरो द्वारा बनाया गया अब तक का सबसे भारी उपग्रह है। सबसे बड़ी कामयाबी यह रही कि उपग्रह धरती से छत्तीस हजार किलोमीटर ऊपर भूस्थिर कक्षा में बिना किसी बाधा के स्थापित कर दिया गया। यह एक जटिल प्रक्रिया होती है जिसमें सफलता को लेकर कई बार आशंकाएं बनी रहती हैं। वैज्ञानिकों के लिए यह चुनौती भरा इसलिए भी था कि इतना भारी उपग्रह पहले कभी नहीं छोड़ा गया था। इस साल मार्च में भारत ने जीसैट-6 ए छोड़ा था, जो अपने मिशन में कामयाब नहीं हो पाया था। इसे खासतौर से सैन्य उपयोग के लिए बनाया था, ताकि इससे मिलने वाली सूचनाओं से दुश्मनों के ठिकानों का पता लगाया जा सके। इसके अलावा जीसैट-6 ए से मोबाइल संचार में भी क्रांति आती। लेकिन इस मिशन की विफलता से हमारे वैज्ञानिकों ने सबक लिया और काम जारी रखा था, जिसका परिणाम अब जीसेट-11 की सफलता के रूप में सामने आया है। हालांकि जीसैट-11 को पहले ही छोड़ा जाना था, लेकिन जीसेट-6 ए का मिशन कामयाब नहीं हो पाने के कारण इसका प्रक्षेपण कुछ समय के टाल दिया गया था।

आज हम इंटरनेट के युग में जी रहे हैं। देश को आज तेज इंटरनेट सेवाओं की जरूरत है, जो हमारे पास नहीं हैं। इसलिए इंटरनेट और मोबाइल क्रांति के लिए ही जीसैट शृंखला के उपग्रह तैयार किए जा रहे हैं। देश में ब्रॉडबैंड सेवाओं को तेज और दुरुस्त बनाने के लिए जिन चार उपग्रहों की योजना बनाई गई थी, जीसैट-11 इनमें से एक है। इस शृंखला के दो उपग्रह पहले छोड़े जा चुके हैं और एक जीसेट-20 अगले साल छोड़ा जाएगा। इसरो का दावा है कि जीसैट-11 जिस रफ्तार से डाटा भेजेगा, वह अकल्पनीय है। इसमें जो चालीस ट्रांसपोंडर लगे हैं वे चौदह गीगाबाइट प्रति सेकेंड की रफ्तार से डाटा भेजेंगे, इससे हमें ज्यादा तेज ब्रॉडबैंड सेवा मिल सकेगी। आज देश में डिजिटल क्रांति में इंटरनेट की सुस्त रफ्तार सबसे बड़ी बाधा है। तमाम दूरसंचार कंपनियां जितनी इंटरनेट स्पीड देने का जो वादा और दावा करती हैं, हकीकत में उसका आधा भी मुहैया नहीं करा पा रहीं। हालांकि इसके और भी कारण हैं। लेकिन जीसैट-11 की मदद से उच्च क्षमता वाले सूचना तकनीक उपकरणों को बनाने का रास्ता भी खुलेगा जो इंटरनेट की रफ्तार व इससे जुड़ी सेवाओं को और तेज बनाएंगे।

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