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संपादकीय: फ्रांस में अशांति

अभी तक फ्रांस को लेकर दुनिया में यह छवि बनी हुई है कि वह यूरोप का सर्वाधिक विकसित और ताकतवर देश है। लेकिन पिछले कुछ समय से फ्रांस में जो कुछ चल रहा है, उससे अलग ही तस्वीर सामने आ रही है। कहने को फ्रांस दुनिया का परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र है, सुरक्षा परिषद का […]

Author Published on: December 11, 2018 5:37 AM
तेल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ फ्रांस की सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं। (Image Source: Reuters)

अभी तक फ्रांस को लेकर दुनिया में यह छवि बनी हुई है कि वह यूरोप का सर्वाधिक विकसित और ताकतवर देश है। लेकिन पिछले कुछ समय से फ्रांस में जो कुछ चल रहा है, उससे अलग ही तस्वीर सामने आ रही है। कहने को फ्रांस दुनिया का परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र है, सुरक्षा परिषद का सदस्य है, लेकिन उसके अंदरूनी हालात बता रहे हैं कि घरेलू मोर्चे पर उसके हाथ-पैर फूले पड़े हैं। इन दिनों फ्रांस के कई शहर हिंसा की आग में झुलस रहे हैं। हालांकि इन दंगों के पीछे कुछ और भी कारण बताए जा रहे हैं, लेकिन इनके मूल में सरकार की आर्थिक नीतियां और उनकी वजह से बिगड़ती माली हालत बड़े कारण बन गए हैं। इसकी वजह से आम जनता को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। फ्रांस की सड़कों पर इस वक्त जो धरने-प्रदर्शन, हिंसा और आगजनी हो रही है, वे देश में महंगे होते र्इंधन को लेकर हैं। फ्रांस में पेट्रोल और डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं। ऐसे में वहां मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग के लोगों को सबसे ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर देश में इतना उबाल आ सकता है, इसका अंदाजा शायद फ्रांस की सरकार को नहीं रहा होगा। हालांकि पिछले साल राष्ट्रपति मैक्रों के सत्ता में आने के बाद से ही उनकी आर्थिक नीतियों को लेकर देश में विरोध के स्वर उठ रहे हैं। इस साल मई में जब फ्रांस की सरकार ने एक लाख से ज्यादा सरकारी नौकरियां खत्म कर दी थीं, तब भी फ्रांस में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे। महंगे होते पेट्रोल के खिलाफ पीली जैकेट पहने हुए सड़कों पर उतरे लोगों के इस आंदोलन की कमान ‘येलो वेस्ट’ संगठन ने संभाल रखी है। देशभर में आंदोलन चला रहा यह संगठन राष्ट्रपति के इस्तीफे की मांग पर अड़ गया है। पहले कुछ दिनों तक तो राष्ट्रपति ने हालात को नजरदांज किया, लेकिन अब जब स्थिति बेकाबू हो गई है तो राष्ट्रपति ने कुछ झुकने के संकेत दिए हैं। फौरी तौर पर फ्रांस की सरकार ने र्इंधन पर और कर लगाने का फैसला टाल दिया है। लेकिन आंदोलन जिस व्यापक पैमाने पर चल रहा है उससे लगता नहीं है कि येलो वेस्ट इतने भर से संतुष्ट हो जाएगा। करों की दरें कम करने, न्यूनतम मजदूरी और पेंशन बढ़ाने जैसी मांगें जब तक नहीं मान ली जातीं तब तक आंदोलनकारी झुकने वाले नहीं।

फ्रांस में दंगों की एक वजह इस देश में रह रहे अफ्रीकी और अरब मूल के लोगों को भी माना जा रहा है। बाहरी लोगों और पुलिस के बीच टकराव होता रहा है। इस साल अक्तूबर के आखिर में दो किशोर पेरिस के बाहरी इलाके में पुलिस से बचने के लिए भागकर एक बिजलीघर के पास जा छिपे थे और वहां करंट लग जाने से दोनों की मौत हो गई थी। इसके बाद वहां हिंसा भड़क उठी। इस घटना ने तब और तूल पकड़ लिया जब फ्रांस के गृहमंत्री ने यह कह दिया कि ये लोग कचरा हैं और इस कचरे को वैसे ही साफ कर दिया जाएगा जैसे फैक्टरी का कचरा साफ किया जाता है। गृहमंत्री की इस टिप्पणी ने आग में घी का काम किया और कई शहर जल उठे। अब क्रिसमस को कुछ ही दिन रह गए हैं। कारोबार पूरी तरह ठंडा पड़ा है। अर्थव्यवस्था चौपट है। लोग खौफ और गुस्से में हैं। ऐसे में फ्रांस की आग यूरोप के लिए कहीं मुश्किलें न खड़ी कर दे!

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