ताज़ा खबर
 

संपादकीय: गवाह की सुरक्षा

किसी भी मुकदमे के फैसले में गवाही की सबसे अहम भूमिका होती है और जब गवाहों का ही जीवन खतरे में हो तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि न्याय प्रक्रिया में किस स्तर की बाधा खड़ी हो सकती है। यही वजह है कि गवाहों की सुरक्षा या उनके संरक्षण के लिए एक ठोस पहलकदमी या कानून बनाने की मांग लंबे समय से होती रही है।

Author December 7, 2018 6:01 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

अदालतों में सुनवाई के बाद बहुत सारे मुकदमों का फैसला इसलिए पलट जाता या फिर उचित निर्णय तक पहुंचना मुश्किल होता है कि उसमें गवाही देने वाले किन्हीं कारणों से अपने पहले के बयानों से मुकर जाते हैं। ऐसे मामलों में एक संवेदशील पक्ष यह होना चाहिए कि इसे केवल गवाहों के झूठ बोलने के आरोप से इतर गवाही देने वाले व्यक्ति के सामने पैदा हालात के मद्देनजर भी देखा जाए। ऐसे तमाम मामले सामने आते रहते हैं, जिनमें किसी अपराधी के खिलाफ गवाही देने के बाद संबंधित व्यक्ति पर जानलेवा हमला किया गया या उसकी हत्या कर दी गई या उसके परिवार को धमकी दी गई। जाहिर है, अगर किसी मुकदमे में गवाह अपने बयान से पीछे हट जाता है तो उसका कारण झूठ बोलने के उलट कुछ कड़वी जमीनी हकीकत भी हो सकती है। किसी भी मुकदमे के फैसले में गवाही की सबसे अहम भूमिका होती है और जब गवाहों का ही जीवन खतरे में हो तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि न्याय प्रक्रिया में किस स्तर की बाधा खड़ी हो सकती है। यही वजह है कि गवाहों की सुरक्षा या उनके संरक्षण के लिए एक ठोस पहलकदमी या कानून बनाने की मांग लंबे समय से होती रही है।

अब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से तैयार गवाह सुरक्षा योजना-2018 के एक मसौदे को मंजूरी दे दी है और संसद द्वारा इस संबंध में कानून बनाए जाने तक सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इसका पालन करने का निर्देश दिया है। इसमें गवाहों और उनके परिजनों को सुरक्षा प्रदान करने का प्रावधान है। अगर इस पर अमल सुनिश्चित होता है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले वक्त में अदालतों में गवाही देने वाले लोग रसूखदार या खतरनाक आरोपियों के खिलाफ बयान देने से भयभीत नहीं होंगे। अदालत का यह निर्देश आसाराम बापू से जुड़े बलात्कार मामले में गवाहों के संरक्षण के लिए जनहित याचिका की सुनवाई के बाद सामने आया है। गौरतलब है कि आसाराम के खिलाफ गवाही देने वाले कई लोगों की हत्या कर दी गई और कई पर जानलेवा हमला किया गया था। इसलिए इस मामले के साथ-साथ समूची न्याय-प्रक्रिया में इंसाफ सुनिश्चित करने के लिहाज से गवाहों की सुरक्षा की दिशा में सरकार की ओर तैयार मसौदे और उसे सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी एक महत्त्वपूर्ण पहल है।

अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, इटली, कनाडा और हांगकांग जैसे कई देशों में गवाहों की सुरक्षा के लिए योजनाएं लागू हैं। हमारे देश में भी गवाहों की सुरक्षा की यह पहलकदमी बहुत पहले होनी चाहिए थी, क्योंकि संरक्षण की व्यवस्था न होने की वजह से न जाने कितने ऐसे मामलों में गवाहों को मार डाला गया, उन्हें या उनके परिजनों को डरा-धमका कर अदालत में दिया गया बयान वापस लेने पर मजबूर किया गया, जिनमें गवाहों के सच पर टिके रहने पर आरोपियों को सख्त सजा हो सकती थी। इसी के मद्देनजर करीब डेढ़ दशक पहले आपराधिक न्याय प्रणाली पर गठित वी. मलिमथ समिति ने अलग से गवाह सुरक्षा कानून बनाने की सिफारिश की थी। इसके अलावा, 2006 में विधि आयोग ने भी अपनी एक रिपोर्ट में इस मसले पर एक कानून का मसौदा तैयार किया था। फिलहाल भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों में गवाहों की सुरक्षा मुहैया कराने का प्रावधान है। इसके बावजूद हमारे देश में बहुत सारे मामलों में गवाहों की जिंदगी किस कदर जोखिम में होती है, यह किसी से छिपा नहीं है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App