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संपादकीय: मुआवजे की राहत

भीड़ में तब्दील हो गए लोगों के सोचने-समझने की क्षमता इस कदर बाधित हो जाती है कि वे किसी शक या घटना के सही या गलत पर विचार तक कर सकने लायक नहीं रह जाते। इसके बाद वे ऐसी गतिविधियों में शामिल हो जाते या बह जाते हैं, जो न केवल अपराध, बल्कि इंसानियत के खिलाफ होती हैं।

Author December 1, 2018 5:43 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

पिछले कुछ समय के दौरान देश भर में भीड़ की हिंसा और उसमें कुछ लोगों के मारे जाने के कई मामले सामने आए। इस मसले पर तमाम आवाजें उठीं कि सरकार को ऐसी हिंसा पर रोक लगाने के लिए सख्त कदम उठाने चाहिए। पर अब तक ऐसी कोई पहलकदमी नहीं हुई है, जिससे कहा जा सके कि सरकार इस मसले पर गंभीर है। ऐसी घटनाओं के संदर्भ में एक सवाल यह भी उठा था कि जो लोग भीड़ की हिंसा का शिकार होते हैं, सरकार उन्हें मुआवजा दे। यह मांग इसलिए भी वाजिब थी कि अगर कुछ लोग बेलगाम होकर महज शक की वजह से पीट-पीट कर किसी की हत्या कर देते हैं, तो यह आखिरकार सरकार की सुरक्षा-व्यवस्था की नाकामी है। इसकी जिम्मेदारी सरकार को ही लेनी चाहिए और मृतक के परिजनों को मुआवजा देना चाहिए। इस लिहाज से देर से ही सही, महाराष्ट्र सरकार का पुणे में भीड़ के हाथों मारे गए एक युवक के परिजनों को दस लाख रुपए मुआवजा देने का फैसला एक सकारात्मक कदम है।

गौरतलब है कि करीब साढ़े चार साल पहले सोशल मीडिया पर छत्रपति शिवाजी महाराज और दिवंगत बाल ठाकरे की एक तस्वीर से की गई छेड़छाड़ पर हुए विवाद के बाद उन्मादी भीड़ ने आइटी कंपनी में काम करने वाले युवक मोहसिन की पीट-पीट कर हत्या कर दी थी। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि कुछ लोग बेमानी मुद्दों पर इस कदर हिंसक हो जाएं कि उन्हें किसी निर्दोष इंसान की बेरहमी से पीट कर हत्या कर देना भी गुनाह न लगे। दूसरी ओर, एक व्यक्ति को किसी ऐसे शक की वजह से मार डाला जाए, जिससे उसका दूर-दूर का वास्ता न रहा हो। ऐसे हालात किसी भी सभ्य समाज को परेशान करने और चिंता में डालने के लिए काफी होने चाहिए। मगर पिछले कुछ सालों में ऐसे कई मामले सामने आए, जिनमें कहीं गाय के नाम पर, तो कहीं बच्चा चोरी की अफवाह से आवेशित भीड़ ने किसी को पकड़ा और पीट-पीट कर मार डाला।

दरअसल, भीड़ में तब्दील हो गए लोगों के सोचने-समझने की क्षमता इस कदर बाधित हो जाती है कि वे किसी शक या घटना के सही या गलत पर विचार तक कर सकने लायक नहीं रह जाते। इसके बाद वे ऐसी गतिविधियों में शामिल हो जाते या बह जाते हैं, जो न केवल अपराध, बल्कि इंसानियत के खिलाफ होती हैं। जरूरी नहीं कि इस तरह की भीड़ में शामिल होने वाले लोग आदतन अपराधी हों, लेकिन यह भी तथ्य है कि वे किसी राजनीतिक मकसद से फैलाए गए अफवाह का शिकार हो जाते हैं। अफवाह फैला कर राजनीतिक हित साधना कुछ असामाजिक तत्त्वों का मकसद हो सकता है। मगर ऐसे तत्त्वों पर लगाम लगाने में सरकारी तंत्र की भूमिका अहम है। ऐसी घटनाएं जब लगातार सामने आने लगें तो जागरूकता अभियान चलाने और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर चौकसी से लेकर भीड़ में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई जैसे कदम उठा कर बहुत सारे लोगों को हिंसक भीड़ में शामिल होने से रोका जा सकता है। इस मसले पर करीब चार महीने पहले सुप्रीम कोर्ट ने साफतौर पर कहा था कि कोई व्यक्ति अपने आप में कानून नहीं बन सकता और लोकतंत्र में भीड़तंत्र की इजाजत नहीं दी जा सकती। सरकारों को यह बात याद रखना चाहिए कि यह सुनिश्चित करना उनकी ही जिम्मेदारी है।

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