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संपादकीय: उम्मीदों के बीच

ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिसकी वजह से कई देशों को बाढ़ का सामना करना पड़ा है। जंगलों के कटाव से पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन गड़बड़ा चुका है और जंगल आग की लपटों में समा रहे हैं। दुनिया का कोई भी देश इन आपदाओं से अछूता नहीं रह गया है। सवाल है ऐसे में क्या हो?

Author December 4, 2018 5:41 AM
पोलैंड के शहर कातोवित्स में जलवायु शिखर सम्मेलन में शामिल देशों के प्रतिनिधि। (Image Source: REUTERS)

जलवायु संकट से निपटने के लिए पोलैंड के शहर कातोवित्स में दुनिया के ज्यादातर देशों का जमावड़ा शुरू हो चुका है। सभी की चिंता एक है कि धरती के बिगड़ते पर्यावरण को कैसे बचाया जाए। हालांकि यह सालाना जलवायु शिखर सम्मेलन पिछले कई सालों से हो रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि इसके बावजूद धरती का वातावरण लगातार बिगड़ता जा रहा है। इसकी पहली और बड़ी वजह यही है कि सम्मेलन की समाप्ति पर जो घोषणाएं और समझौते होते हैं, वे धरातल पर नहीं उतर पाते। सदस्य राष्ट्र उन पर ठोस अमल नहीं करते। ऐसे में धरती को बचाने की चिंता एक बेमानी रुदन से ज्यादा कुछ नहीं रह जाती। इस बार भी स्थिति इससे ज्यादा अलग नहीं है। दुनिया को पिछले कुछ दशकों में गंभीर प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा है। यह तथ्य है कि औद्योगीकरण और विकास की मार धरती के लिए भारी पड़ी है। ग्रीनहाउस गैसों के अनवरत उत्सर्जन का दुष्परिणाम ओजोन परत में छेद के रूप सामने है। धरती और वातावरण की गरमी इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि धुव्रों पर जमी बर्फ पिघल रही है और सुमद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। इससे तटीय शहरों के डूबने का खतरा सामने है। सुनामी जैसी आपदा अब कहीं ज्यादा जल्दी-जल्दी दस्तक दे रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिसकी वजह से कई देशों को बाढ़ का सामना करना पड़ा है। जंगलों के कटाव से पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन गड़बड़ा चुका है और जंगल आग की लपटों में समा रहे हैं। दुनिया का कोई भी देश इन आपदाओं से अछूता नहीं रह गया है। सवाल है ऐसे में क्या हो?

पोलैंड के जलवायु सम्मेलन में जिस सबसे बड़ी समस्या से सदस्य देश फिर माथापच्ची करेंगे, वह यह कि धरती के बढ़ते तापमान को कैसे काबू किया जाए, जो आज जीवों के अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह सदी बढ़ते तापमान के गंभीर खतरे लिए हुए है। इसलिए आने वाले कुछ दशकों में धरती का तापमान दो डिग्री सेल्सियस तक काबू करने की गंभीर चुनौती दुनिया के सामने है। हाल में अर्जेंटीना में समूह-20 देशों के शिखर सम्मेलन में भी पोलैंड के जलवायु सम्मेलन को सफल बनाने के लिए खासतौर से चर्चा हुई थी। तीन साल पहले दुनिया के ज्यादातर देशों ने जिस पेरिस जलवायु समझौते का समर्थन करते हुए पर्यावरण को बचाने का संकल्प लिया था, उसके नतीजे पोलैंड के इस सम्मेलन में दिखाई पड़ने की उम्मीद है। हालांकि दुखद यह रहा कि अमेरिका ने इस करार को मानने से इनकार करते हुए अपने को समझौते से अलग कर लिया था। अमेरिका का कहना था कि इस समझौते में ऐसे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों वाले प्रावधान हैं जो अमेरिकी हितों पर बुरा असर डालेंगे।

धरती को बचाने के लिए सम्मेलन और शिखर बैठकें सालों से हो रही हैं, लेकिन ताकतवर राष्ट्रों के निहित स्वार्थों के कारण धरती को बचाने की कोई भी बात सिरे नहीं चढ़ पा रही। अमीर राष्ट्र पर्यावरण बिगाड़ने का सारा ठीकरा गरीब राष्ट्रों पर फोड़ते रहे हैं। दुनिया के आधे से ज्यादा देशों की हालत आज भी यह है कि वहां र्इंधन के रूप में कोयला और लकड़ी जलाई जाती है, वाहनों और कारखानों से होने वाले प्रदूषण से निपटने की कोई योजना नहीं है। दिल्ली का ही उदाहरण लें, जहां ऐसे लाखों डीजल वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं जिनकी अवधि पूरी हो चुकी है। ऐसे में पोलैंड का सम्मेलन कुछ रास्ता दिखाएगा, इसकी उम्मीद की जानी चाहिए।

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