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संपादकीय: मंदिर पर घमासान

शिवसेना प्रमुख ने अयोध्या में बेशक कहा कि वे मंदिर मामले में कोई राजनीति नहीं कर रहे, पर उनके अचानक सक्रिय होने से साफ है कि उन्होंने इसे भाजपा के साथ जोर आजमाइश के मौके के तौर पर चुना है। भाजपा के एक विधायक ने उद्धव ठाकरे पर निशाना भी साधा कि वह महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हमले कर अपनी राजनीति करते आए हैं, अब उन्हें उत्तर भारत के मसले में अचानक दिलचस्पी कैसे पैदा हो गई।

Author November 26, 2018 4:04 AM
सरयू किनारे बसे अयोध्या का दृश्य (फाइल फोटो)

अयोध्या में राम मंदिर बनाने को लेकर केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। अदालत में यह मामला अभी लंबा खिंचता नजर आ रहा है, इसलिए पहले विश्व हिंदू परिषद ने दबाव बनाना शुरू किया कि मंदिर बनाने के लिए सरकार कानून बनाए या अध्यादेश जारी करे। पर भारतीय जनता पार्टी शुरू से कहती आ रही है कि वह संविधान में विश्वास करती है, इसलिए वह न्यायालय के आदेश की प्रतीक्षा कर रही है। पिछले आम चुनाव में भाजपा ने वादा किया था कि अगर उसकी सरकार बनी, तो वह राम मंदिर का निर्माण कराएगी। मगर अब इस सरकार का कार्यकाल पूरा होने को है और मंदिर निर्माण के मामले में कोई गति नहीं आ पाई है। इसलिए विहिप का कहना है कि अब इस मामले में लोगों का धैर्य टूट रहा है, चाहे जैसे हो वह मंदिर बनवा कर रहेगी। इस तरह विहिप का दबाव तो था ही, शिवसेना ने भी तीखे प्रहार शुरू कर दिए। वह भी अपने समर्थकों के साथ विहिप की बुलाई धर्म सभा में शिरकत करने अयोध्या जा पहुंची। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने धमकी भी दे डाली कि अगर मंदिर नहीं बना, तो सरकार भी नहीं बनेगी।

अयोध्या की धर्म सभा ने केंद्र सरकार के सामने धर्मसंकट खड़ा कर दिया है। मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने की प्रक्रिया जटिल है और वह इतनी जल्दी संभव नहीं है। फिर अगर वह अध्यादेश जारी करती है, तो उसका कानून पर भरोसे वाला तर्क झूठा साबित होगा। इससे देश में नए तरह का विवाद पैदा होने का खतरा भी है। हालांकि अदालत ने कहा था कि अगर संत समाज और सभी धार्मिक-राजनीतिक दलों के साथ मिल-बैठ कर कोई सर्वमान्य हल निकाल लिया जाए, तो मंदिर निर्माण की राह सुगम हो जाएगी। मगर विहिप खुद कुछ ऐसे मसलों को तूल दे रही है, जो अड़चन पैदा कर सकते हैं। मसलन, वह पूरी भूमि पर मंदिर निर्माण कराना चाहती है, जबकि उसका कुछ हिस्सा बाबरी मस्जिद के दावेदारों को भी देने का निर्णय हुआ था। इस आंदोलन में नई-नई शामिल हुई शिवसेना ने भी विहिप का ही रुख अपनाया हुआ है। इस तरह यह मामला आसान नहीं लगता। उधर उत्तर प्रदेश सरकार ने राम की मूर्ति लगाने का नक्शा जारी किया है, जिससे जाहिर है कि वह फिलहाल कोई विवाद नहीं पैदा करना चाहती। पर इसे पूरे प्रकरण में शिवसेना के रुख से एक राजनीतिक कोण जरूर जुड़ गया है।

शिवसेना प्रमुख ने अयोध्या में बेशक कहा कि वे मंदिर मामले में कोई राजनीति नहीं कर रहे, पर उनके अचानक सक्रिय होने से साफ है कि उन्होंने इसे भाजपा के साथ जोर आजमाइश के मौके के तौर पर चुना है। भाजपा के एक विधायक ने उद्धव ठाकरे पर निशाना भी साधा कि वह महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हमले कर अपनी राजनीति करते आए हैं, अब उन्हें उत्तर भारत के मसले में अचानक दिलचस्पी कैसे पैदा हो गई। दरअसल, जबसे महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना को अलग-थलग कर दिया है, वह अब तक अपनी चोट सहला रही है। जब भी मौका मिलता है, वह भाजपा के खिलाफ खड़ी दिखती है। अयोध्या में राम मंदिर मुद्दे को एक तरह से लपक लेने की उसकी कोशिश भी इसी का नतीजा है। हालांकि राम मंदिर निर्माण पर उसके रुख का शायद ही बहुत असर पड़े, पर सरकार को सोचने पर मजबूर जरूर किया है।

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