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खुदकुशी की पढ़ाई

भविष्य संवारने के लिए की जाने वाली पढ़ाई क्या एक ऐसी होड़ में तब्दील होनी चाहिए कि न केवल वर्तमान, बल्कि जीवन ही खत्म हो जाए? बीते कई सालों से इंजीनियरिंग या मेडिकल की पढ़ाई करने वाले बच्चों की खुदकुशी की खबरें कुछ इसी तरह की होड़ की जमीन रच रही हैं। राजस्थान के कोटा शहर से पिछले तीन दिनों के दौरान आत्महत्या की तीसरी घटना से एक बार फिर यह सवाल उठा है कि पढ़ाई को इस कदर बोझ बना कर बच्चों के ऊपर लाद देना कितना सही है कि उसके दबाव में उनका जीवन ही चला जाए।

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भविष्य संवारने के लिए की जाने वाली पढ़ाई क्या एक ऐसी होड़ में तब्दील होनी चाहिए कि न केवल वर्तमान, बल्कि जीवन ही खत्म हो जाए? बीते कई सालों से इंजीनियरिंग या मेडिकल की पढ़ाई करने वाले बच्चों की खुदकुशी की खबरें कुछ इसी तरह की होड़ की जमीन रच रही हैं। राजस्थान के कोटा शहर से पिछले तीन दिनों के दौरान आत्महत्या की तीसरी घटना से एक बार फिर यह सवाल उठा है कि पढ़ाई को इस कदर बोझ बना कर बच्चों के ऊपर लाद देना कितना सही है कि उसके दबाव में उनका जीवन ही चला जाए। कोटा में आइआइटी-जेईई की तैयारी कर रहे बिहार के एक छात्र ने जिस तरह आत्महत्या कर ली, तो क्या इसके पीछे कारण यह ढूंढ़ा जाएगा कि वह भीतर से कमजोर था? दरअसल, इस दलील के पर्दे में हमारा समाज और हमारी व्यवस्था एक आड़ खोज लेती है, जिसमें ऐसी घटनाओं में अपनी एक बड़ी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की जाती है। गौरतलब है कि इस साल जनवरी से लेकर अब तक वहां से उन्नीस बच्चों के खुदकुशी कर लेने की खबरें आ चुकी हैं। सवाल है कि भविष्य बनाने के नाम पर बच्चों की जान लेने की इस व्यवस्था का हासिल क्या है?

यह किसी से छिपा नहीं है कि इस तरह की लगभग सभी घटनाओं में यही तथ्य उभर कर सामने आया है कि पाठ्यक्रम की पढ़ाई और उसकी परीक्षा में फेल होने के डर से उपजे तनाव ने आखिर बच्चों के सामने ऐसा अंधेरा पैदा कर दिया जिसमें उन्होंने गुम होने का ही रास्ता चुना। यह सही है कि वहां बहुत सारे विद्यार्थी इंजीनियरिंग की परीक्षा पास करने के लिए कोचिंग या पढ़ाई कर रहे हैं और सबके साथ ऐसा नहीं होता। लेकिन साल भर में उन्नीस बच्चों ने अगर आत्महत्या कर ली, तो क्या इस संख्या को छोटी कहा जा सकता है? जिन विद्यार्थियों को सहज ढंग से पढ़ाई करके इंजीनियर या डॉक्टर बनना चाहिए था या किसी और क्षेत्र में अपनी जगह बनानी चाहिए थी, वे खुदकुशी का रास्ता क्यों चुन रहे हैं? विडंबना यह है कि इंजीयरिंग और मेडिकल की पढ़ाई को जिस तरह एक प्रतिष्ठा और रसूख से जोड़ दिया गया है, उसमें बहुत सारे अभिभावकों को अपने बच्चों की रुचियां और क्षमता को समझना जरूरी नहीं लगता है और उन्हें इन विषयों की तैयारी में झोंक दिया जाता है।

दरअसल, कोचिंग संस्थानों से संपर्क करने के बाद वहां उन्हें बिना किसी आधार के कामयाबी की सौ फीसद गारंटी दी जाती है। लेकिन इसके बाद पाठ्यक्रम, तैयारी और दबाव के जो दौर शुरू होते हैं, उसमें सामान्य मानवीय पहलुओं की घनघोर अनदेखी होती है। मनोविज्ञान के लिहाज से देखें तो ज्यादातर बच्चों को एक मशीन की तरह बना दिया जाता है, जबकि संवेदनाओं के उतार-चढ़ाव से किसी भी व्यक्ति को पूरी तरह आजाद नहीं किया जा सकता। ऐसे में कई बच्चे पढ़ाई की दिनचर्या और कामयाबी की शर्त की चक्की में पिसने लगते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक बच्चे खुद को नुकसान पहुंचाते हैं, नशे, अनिद्रा, अकेलेपन जैसी कई समस्याओं के शिकार हो जाते हैं। पिछले कई सालों से ऐसे मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है और यही वजह है कि लोगों का ध्यान इस ओर आकृष्ट हुआ है और इसे एक गंभीर समस्या के रूप में चिह्नित किया गया है। आइआइटी में दाखिले के लिए कोटा स्थित कोचिंग संस्थानों को एक खास प्रसिद्धि मिल चुकी है और वहां बड़ी तादाद में बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। लेकिन हर हाल में कामयाब ही होने की शर्त ने आज बच्चों के सामने जानलेवा हालात पैदा कर दिए हैं।

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