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संपादकीय: आचरण का सवाल

नोटबंदी से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान वकीलों के ऊंची आवाज में बोलने पर वे इतने आहत हुए थे कि उन्हें अदालत में यह कहना पड़ा कि मैंने अपने जीवन में अदालत में वकीलों का ऐसा दुर्व्यवहार नहीं देखा।

Author नई दिल्ली | August 17, 2019 1:59 AM
गुरुवार को स्वतंत्रता दिवस समारोह के मौके पर देश के प्रधान न्यायाधीश ने अपने संबोधन में अमर्यादित आचरण की बढ़ती घटनाओं पर चिंता व्यक्त की।

पिछले कुछ सालों में देश की न्यायपालिका को अपने भीतर ही अमर्यादित आचरण की घटनाओं का सामना करना पड़ा है। चिंताजनक बात तो यह है कि इस तरह की घटनाएं रुकने का नाम ले रहीं, बल्कि बढ़ती जा रही हैं। इससे न्यायपालिका की छवि और साख धूमिल होती है। गुरुवार को स्वतंत्रता दिवस समारोह के मौके पर देश के प्रधान न्यायाधीश ने अपने संबोधन में अमर्यादित आचरण की बढ़ती घटनाओं पर चिंता व्यक्त की। वे सबसे ज्यादा व्यथित इस बात से नजर आए कि अदालतों में अब शालीनता नहीं रह गई है और अदालतों में जिरह के दौरान जिस तरह का मुखर आचरण देखा जा रहा है, वह एक स्वस्थ न्यायपालिका की निशानी नहीं कहा जा सकता।

इसमें कोई दो राय नहीं कि देशभर की अदालतों में इस तरह के दृश्य आम हैं। जिला स्तर की अदालतों में तो कई बार ऐसी घटनाएं देखने में आती हैं जो यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या ये अदालतें हैं या कुछ और। वकीलों का आपस में लड़ना, जजों के साथ अप्रिय संवाद के अनेक किस्से देखने को मिल जाते हैं। इस तरह की घटनाएं और न्याय व्यवस्था से जुड़े लोगों का आचरण न्यायपालिका के लिए असहज स्थिति उत्पन्न कर देता है। इसलिए प्रधान न्यायाधीश ने जो कहा उसका सार यही है कि न्यायपालिका को इस तरह की दुष्प्रवृत्तियों से बचाना सबसे पहला काम होना चाहिए। यह कोई पहला मौका नहीं है जब अदालतों में बढ़ते अमर्यादित आचरण को लेकर प्रधान न्यायाधीश ने कुछ कहा है।

तीन साल पहले भी तबके प्रधान न्यायाधीश ने इसी मसले पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। नोटबंदी से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान वकीलों के ऊंची आवाज में बोलने पर वे इतने आहत हुए थे कि उन्हें अदालत में यह कहना पड़ा कि मैंने अपने जीवन में अदालत में वकीलों का ऐसा दुर्व्यवहार नहीं देखा। एक वरिष्ठ वकील के सीमाएं लांघने पर उन्होंने नाराजगी जाहिर करते हुए था कि आए दिन वकील अदालतों में इस तरह का व्यवहार कर रहे हैं जैसे वे अदालत में नहीं हों बल्कि किसी मछली बाजार में हों। इस बात को तीन साल गुजर चुके हैं। जाहिर है, न्यायपालिका में कोई सुधार नहीं आया। इसीलिए गुरुवार को प्रधान न्यायाधीश ने इस तरह की घटनाओं पर फिर से अपनी बात रखी।

अदालत में जजों के सामने ऊंची आवाज में बोलने को लेकर कई बार तो जजों को ऐसे वकीलों के खिलाफ कार्रवाई की धमकी तक देनी पड़ी है। सवाल है कि अदालतों को अमर्यादित आचरण वाली घटनाओं से बचाया कैसे जाए? कई बार वकील उग्रता पर उतारू हो जाते हैं और अप्रिय घटनाओं का अंदेशा बना रहता है। प्रधान न्यायाधीश का कहना है कि ऐसा करने वालों की पहचान होनी चाहिए और इन्हें अदालती व्यवस्था से अलग-थलग किया जाना चाहिए। लेकिन व्यवहार में यह इतना आसान है नहीं।

इसके लिए बार कौंसिल, बार एसोसिएशन जैसी संस्थाओं को ही पहल करनी होगी। अगर अदालतों की गरिमा को चोट पहुंचती है तो जनता में इसका अच्छा संदेश नहीं जाता। अदालतों को लोग न्याय के मंदिर के रूप में देखते हैं। ऐसे में अगर न्याय के इन मंदिरों में कुछ भी गलत या अप्रिय होता है तो न्याय को लेकर भी लोगों में संदेह पैदा होता है। अगर अदालतों को जनता के बीच अपनी साख और विश्वास बनाए रखना है तो उससे जुड़े सभी पक्षों को अपने आचरण को मर्यादित बनाना होगा।

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