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संपादकीय: लापरवाही के बोल

भारत के राजनीतिक परिदृश्य में नेताओं या उच्च पदों पर बैठे लोगों की बोली बिगड़ने से उपजे विवाद जब-तब सामने आते रहते हैं। ज्यादातर मौके पर यह बहस का मसला बनता है और ऐसी सलाहें सामने आती हैं कि सार्वजनिक जीवन वाले जाने-माने लोगों और नेताओं को बोलते समय शब्दों का प्रयोग सावधानी से करना चाहिए।

जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक। (एक्सप्रेस फोटोः प्रवीण जैन)

भारत के राजनीतिक परिदृश्य में नेताओं या उच्च पदों पर बैठे लोगों की बोली बिगड़ने से उपजे विवाद जब-तब सामने आते रहते हैं। ज्यादातर मौके पर यह बहस का मसला बनता है और ऐसी सलाहें सामने आती हैं कि सार्वजनिक जीवन वाले जाने-माने लोगों और नेताओं को बोलते समय शब्दों का प्रयोग सावधानी से करना चाहिए। इससे न केवल उनके पक्ष या विचार को लोग सुनने और उस पर राय बनाने के लिए तैयार होते हैं, बल्कि उनके अपने कद की गरिमा भी बनी रहती है। लेकिन ऐसे किसी मामले की याद पुरानी पड़ने से पहले ही किसी नेता के ऐसे बोल सामने आ जाते हैं जो किसी अच्छी-भली बातों का जायका बिगाड़ देते हैं। इसी कड़ी में अब जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने देश के धनाढ्य तबकों के रवैये को कसौटी पर रखते हुए उनमें से एक तबके को ‘सड़े आलू’ जैसा बता दिया। हालांकि अमीर तबके के लोगों से उनकी अपेक्षा का आशय समझा जा सकता है। कश्मीर या देश के किसी भी हिस्से के धनाढ्य लोगों से समाज के प्रति संवेदनशीलता की अपेक्षा, अपनी अकूत आय से स्कूल खोलने, शहीदों के परिवारों की मदद की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन क्या इसके लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल करना जरूरी था जो पहली नजर में ही अप्रिय हो?

दरअसल, सत्यपाल मलिक का बयान ऐसे मामलों का ही प्रतिनिधि उदाहरण है जिनमें कई बार बेहद जरूरी मसलों पर राय जाहिर करते हुए इस बात का खयाल रखना जरूरी नहीं समझा जाता कि वह बयान किसी तबके को अपमानित करने वाला हो सकता है। कई बार अपेक्षा और उम्मीद के लिए इस्तेमाल किए गए अवांछित शब्द नकारात्मक प्रतिक्रिया भी पैदा कर सकते हैं। अक्सर कुछ नेताओं के ऐसे बयान सामने आते रहे हैं जिनमें किसी नेता ने महज अपना कोई तात्कालिक राजनीतिक हित साधने के लिए आधारहीन, बेतुकी या उकसाने वाली बात कह दी, जिससे समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच तनाव या टकराव की स्थिति पैदा हो गई। इससे कुछ नेताओं को अपने लिए फौरी लाभ भले नजर आए, लेकिन लंबे समय में इसका नुकसान ही होता है। इससे न केवल किसी संवेदनशील मसले की गंभीरता कम होती है, बल्कि इस तरह के सतही बयानों से बोलने वाले व्यक्ति का कद भी हल्का होता है।

ऐसे मौके अक्सर सामने आते रहे हैं जिनमें कुछ नेता किसी मुद्दे पर बयान देते हुए ऐसे शब्दों का भी इस्तेमाल कर डालते हैं, जो कई बार आपत्तिजनक होते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जिनमें किसी नेता ने अपने किसी प्रतिद्वंद्वी या महिलाओं के संदर्भ में ऐसे बयान दिए जिन्हें काफी अपमानित या मानहानि करने वाला माना गया। उस पर विवाद होने और उसके तूल पकड़ने पर कई बार ऐसा बोलने वालों को माफी मांगने या खेद जताने तक की नौबत आ जाती है। ऐसी स्थिति पैदा होने का सबक यह होना चाहिए कि दूसरे नेता अपनी बोली को लेकर सावधानी बरतते और अपने पद और कद की गरिमा के अनुकूल कुछ बयान देते। मगर न इस प्रवृत्ति में कमी देखी जा रही है, न ऐसे खयाल जाहिर करने वाले नेताओं के भीतर लापरवाही से बोलने के प्रति कोई हिचक दिखाई देती है। यह बेवजह नहीं है कि आए दिन बेलगाम जुबान की वजह से होने वाले ऐसे विवाद ऊंचे कद के नेताओं या दूसरी शख्सियतों की समझ पर सवाल उठाए जाते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि नेताओं या जनप्रतिनिधियों के सार्वजनिक आचरण और जाहिर किए गए विचार आम जनता के लिए राजनीतिक प्रशिक्षण भी साबित होते हैं और उससे उनके सोचने-समझने की दिशा निर्धारित होती है।

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