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संपादकीय: शांति और चुनौती

जम्मू-कश्मीर से धारा 370 के ज्यादातर प्रावधान हटा दिए जाने के बाद सुरक्षा के मद्देनजर सरकार ने घाटी में कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए थे।

Author नई दिल्ली | August 15, 2019 3:19 AM
सांकेतिक तस्वीर।

सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर घाटी में लगे प्रतिबंधों को हटाने के मामले में दखल देने से यह कहते हुए साफ इनकार कर दिया है कि घाटी में हालात अभी बहुत ही संवेदनशील हैं, ऐसे में प्रतिबंधों को हटाने के लिए वह सरकार को कोई निर्देश नहीं देगी। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 के ज्यादातर प्रावधान हटा दिए जाने के बाद सुरक्षा के मद्देनजर सरकार ने घाटी में कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए थे। हालांकि जम्मू क्षेत्र से तो प्रतिबंध हटा लिए गए हैं क्योंकि अब वहां स्थिति सामान्य होने का दावा किया जा रहा है। लेकिन कश्मीर घाटी में हालात संतोषजनक नहीं हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि कश्मीर घाटी के लोगों को इन दिनों जिस तरह के कड़े प्रतिबंधों के बीच रहने को मजबूर होना पड़ रहा है, वह वाकई मुश्किलों भरा है।

निषेधाज्ञा के साथ-साथ घाटी में मोबाइल, लैंड लाइन फोन और इंटरनेट सेवाएं बंद हैं और इससे लोग दूसरी जगहों पर अपने परिजनों की खैरियत तक नहीं ले पा रहे हैं। बाजारों में सन्नाटा पसरा है, काम-धंधे ठप हैं और लोग घरों से बाहर निकलने से भी बच रहे हैं और सबसे बड़ी बात तो यह कि लोगों के मन में भय बना हुआ है कि अब क्या होगा। हाल में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई जिसमें लोगों की दिक्कतों का हवाला देते हुए घाटी से तत्काल सारे प्रतिबंध हटाने की मांग की गई, खासतौर से संचार सेवाओं से जुड़े प्रतिबंध। लेकिन घाटी में इस वक्त जिस तरह के संवेदनशील हालात हैं उसमें प्रशासन कैसे प्रतिबंधों को हटा सकता है, यह याचिकाकर्ता ने नहीं सोचा।

सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि घाटी में जिस तरह के हालात हैं उनमें वहां स्थिति सामान्य करने के लिए प्रशासन को अभी वक्त लगेगा, ऐसे में प्रतिबंधों को हटाने के लिए रातों-रात कुछ नहीं किया जा सकता। सरकार और प्रशासन अपना जो काम कर रहे हैं उसमें अदालत दखल नहीं देगी और जब तक सरकार यह नहीं कह देती कि घाटी में हालात सामान्य हो चुके हैं, तब तक इस बारे में कुछ विचार भी नहीं किया जाएगा।

शीर्ष अदालत का यह रुख सरकार के लिए बड़ी राहत है क्योंकि धारा 370 को बेअसर किए जाने के बाद से ही कई राजनीतिक दल और संगठन वहां लगाए गए प्रतिबंधों पर सवाल उठा रहे हैं। मामला ज्यादा इसलिए भी ज्यादा गरमाया हुआ है कि श्रीनगर में तो अखबार तक बंद हैं। यह प्रेस की आजादी से जुड़ा सवाल है। इस मामले में श्रीनगर के एक स्थानीय अखबार की संपादक ने भी अदालत का दरवाजा खटखटाया है। घाटी को लेकर इस वक्त सरकार के सामने संकटपूर्ण स्थिति है। सुरक्षा के मामले में किसी भी तरह का जोखिम लोगों के लिए भारी पड़ सकता है और कश्मीर को लेकर सरकार के प्रयासों को झटका लग सकता है।

अक्तूबर में सरकार श्रीनगर में निवेशकों का सम्मेलन कराने की तैयारी में है ताकि घाटी में उद्योग लगाने का रास्ता साफ हो सके और नौजवानों को काम-धंधे में लगाया जा सके। ऐसे में आज प्रशासन के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती लोगों को अफवाहों से बचाने की है। अफवाहें हिंसा फैलाने में आग में घी का काम करती हैं। घाटी के कुछ जिलों से तो छिटपुट हिंसा-प्रदर्शन की खबरें आई भी हैं। कश्मीर में लोगों की सुरक्षा और हालात सामान्य बनाना सरकार और प्रशासन की पहली प्राथमिकता है। जब जनजीवन पटरी पर लौटने लगेगा तभी लोगों में भय खत्म होगा और विकास संबंधी काम शुरू हो सकेंगे।

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