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संपादकीय: बेखौफ अपराधी

खुद राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो के आंकड़े बता चुके हैं कि दिल्ली और अंडमान के बाद बच्चों के खिलाफ सबसे ज्यादा अपराध चंडीगढ़ में होते हैं।

Author नई दिल्ली | Published on: August 17, 2019 2:18 AM
सांकेतिक तस्वीर।

चंडीगढ़ में दो बहनों की हत्या की घटना ने एक बार फिर शहर को दहला दिया है और इस बात को भी रेखांकित किया है कि अपराधी किसी कानूनी कार्रवाई और पुलिस के भय के बिना अपनी मनमानी को अंजाम दे रहे हैं। सही है कि पुलिस हर वक्त सभी जगहों पर मौजूद नहीं रह सकती है। लेकिन अगर पुलिस महकमे के कामकाज की शैली ऐसी हो, जिसमें हर मामले में तुरंत कार्रवाई और सख्ती साफ दिखे तो अपराधियों को भीतर एक खौफ काम करेगा और किसी अपराध को अंजाम देने से पहले वे उसके नतीजों पर सोचेंगे। लेकिन चंडीगढ़ में एक पीजी में रहने वाली दो बहनों की हत्या के संबंध में जो ब्योरे सामने आए हैं, उनसे साफ है कि हत्यारे के भीतर शायद किसी का भय नहीं था। खबरों के मुताबिक अपराधी युवक सुबह पांच बजे के आसपास उस मकान में घुसा और चाकू या धारदार हथियार से दोनों बहनों की हत्या करके आराम से निकल गया। घटनास्थल की जांच से पता चला है कि युवक के हमले के बाद दोनों बहनों ने अंतिम दम तक उसका सामना किया, लेकिन जान बचाने में नाकाम रहीं।

अब एक रिवायत की तरह पुलिस का कहना है कि वह अपराधी को खोज निकालेगी। लेकिन पुलिस की ऐसी सक्रियता अपराधों के पहले क्यों नहीं दिखती, जिससे किसी को अपराध को अंजाम देने से पहले रोका जा सके। पुलिस या फिर कानून-व्यवस्था की सख्ती से अपराधी तत्त्वों के बीच एक संदेश जाता है। लेकिन सुरक्षा-व्यवस्था के सरकारी या पुलिस महकमे के इंतजाम के अलावा क्या अपने स्तर पर भी अपराधों को लेकर जागरूकता, सावधानी और आस-पड़ोस को लेकर संवेदनशीलता की जरूरत नहीं है?

चंडीगढ़ में जिस कमरे में दो बहनों की हत्या हुई, क्या उस दौरान आसपास कोई और नहीं था? अगर उस इमारत का इस्तेमाल पीजी यानी पेइंग गेस्ट को रखने के तौर पर भी किया जाता था तो उसमें रहने वालों और खासतौर पर अकेले रहने वाली लड़कियों की सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किए गए थे? सुबह पांच बजे दोनों बहनों के कमरों में दाखिल होने और हत्या करके आराम से भाग जाने के मौके के लिए क्या वहां सुरक्षा गार्ड का नहीं होना जिम्मेदार नहीं है? हालांकि इस सबसे पुलिस की जवाबदेही कम नहीं हो जाती।

आम लोगों के बीच सुरक्षा बोध दरअसल पुलिस महकमे की सक्रियता से ही बनता और कायम रहता है, मगर अपराधी तत्त्वों के बीच पुलिस का खौफ आजकल न के बराबर देखा जा रहा है। चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश है और इस नाते उम्मीद की जाती है कि कम से कम वहां कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर ऐसी व्यवस्था होगी जिससे अपराधों पर लगाम कसी जा सकेगी और आम लोग सुरक्षित महसूस कर सकेंगे। लेकिन सच यह है कि अपराध के मामलों में देश के कुछ दूसरे हिस्सों की तरह चंडीगढ़ में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है।

खुद राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो के आंकड़े बता चुके हैं कि दिल्ली और अंडमान के बाद बच्चों के खिलाफ सबसे ज्यादा अपराध चंडीगढ़ में होते हैं। इसके अलावा, महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी और इस मामले में चंडीगढ़ ग्यारहवें स्थान पर था। अपहरण, लूट और झपटमारी की घटनाओं में भी बढ़ोतरी हुई है। सवाल है कि अगर वहां कानून-व्यवस्था और पुलिस का तंत्र अपना काम ठीक से कर रहा है तो अपराधों के मामले में यह चिंताजनक तस्वीर क्यों है! ऐसे में अगर अपराधी प्रवृत्ति के किसी व्यक्ति ने दोनों बहनों की हत्या कर दी और फरार हो गया तो यह समूचे पुलिस तंत्र की नाकामी है।

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