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संपादकीय: चिकित्सक की सुरक्षा

कोलकाता के एक अस्पताल में एक मरीज की मौत हो जाने के बाद उसके परिजनों और रिश्तेदारों ने आपत्ति दर्ज कराई और फिर चिकित्सकों पर हिंसक हमले किए।

Author नई दिल्ली | August 15, 2019 3:32 AM
सांकेतिक तस्वीर।

कुछ सालों से यह प्रवृत्ति-सी बन गई लगती है कि अस्पतालों में किसी मरीज को माकूल इलाज न मिल पाने पर उसके परिजनों और रिश्तेदारों का गुस्सा फूट पड़ता है। वे हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। पिछले कुछ महीनों में ऐसी कई घटनाएं देखी गईं, जिनके चलते डॉक्टरों और दूसरे चिकित्साकर्मियों में आक्रोश पैदा हुआ। कोलकाता के एक अस्पताल में एक मरीज की मौत हो जाने के बाद उसके परिजनों और रिश्तेदारों ने आपत्ति दर्ज कराई और फिर चिकित्सकों पर हिंसक हमले किए। इसे लेकर डॉक्टरों ने काम करना बंद कर दिया। उनकी हड़ताल को देश भर के स्वास्थ्यकर्मियों का समर्थन मिला। पश्चिम बंगाल सरकार को इस मामले से निपटने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। हफ्तों स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित रहीं। इसी तरह दिल्ली के एक अस्पताल में भी कुछ परिजनों और रिश्तेदारों ने प्रशिक्षण ले रहे एक डॉक्टर पर हमला कर दिया, तो उसके विरोध में आंदोलन शुरू हो गया।

इन घटनाओं के मद्देनजर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने अस्पतालों में तैनाती के दौरान चिकित्सकों और चिकित्सा कर्मियों की सुरक्षा संबंधी मसविदा विधेयक को मंजूरी दे दी है। इस मसविदे में तैनाती के दौरान किसी चिकित्साकर्मी पर हमला, अस्पताल परिसर में तोड़फोड़ या संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर कड़े दंड का प्रावधान किया गया है। प्रस्तावित विधेयक के अनुसार अगर कोई व्यक्ति या समूह किसी चिकित्सीय संस्थान में तैनात किसी डॉक्टर या अन्य चिकित्साकर्मियों पर हमला कर उन्हें गंभीर रूप से घायल कर देते हैं, तो उन्हें तीन से दस साल तक कैद की सजा भुगतनी और दो से दस लाख रुपए तक जुर्माना भरना पड़ सकता है।

इसी तरह अस्पताल की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों को छह महीने से लेकर पांच साल तक की कैद और पचास हजार से लेकर पांच लाख रुपए तक जुर्माने का दंड दिया जा सकता है। उम्मीद की जा रही है कि इस दंडात्मक प्रावधान के बाद अस्पतालों के कामकाज में मरीजों के परिजनों और रिश्तेदारों का नाहक दखल और किसी प्रकार के असंतोष की स्थिति में हिंसक गतिविधियों पर नकेल कसेगी। हालांकि इससे अस्पतालों की सेवाओं और चिकित्साकर्मियों की कर्तव्यनिष्ठता में कितना परिवर्तन आएगा या उनकी विश्वसनीयता कितनी बढ़ेगी, कहना मुश्किल है।

मरीजों को उचित इलाज न मिल पाने, चिकित्सकों की लापरवाही, अस्पतालों की मनमानी, चिकित्साकर्मियों की बेरुखी, भेदभावपूर्ण व्यवहार आदि संबंधी शिकायतें आम हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब अस्पतालों की बेरुखी या मनमानी के चलते कई ऐसे मरीजों की जान चली गई, जो सामान्य उपचार से ठीक हो सकते थे। सरकारी अस्पतालों में तो लापरवाही के अनेक किस्से हैं, निजी अस्पताल भी ऐसे आरोपों से बरी नहीं हैं। इन्हीं सबके चलते मरीजों के परिजनों और रिश्तेदारों या फिर उनके समर्थन में उतरे लोगों का गुस्सा फूट पड़ता है।

यह सही है कि लोगों में बढ़ती इस प्रवृत्ति के चलते अस्पतालों के कामकाज में बाधा उत्पन्न होती है, उसका खमियाजा दूसरे मरीजों को भुगतना पड़ता है, कई बार डॉक्टर सशंकित भी देखे जाते हैं। उन्हें सुरक्षित वातावरण मिलना जरूरी है। मगर यह जरूरत लंबे समय से रेखांकित की जाती रही है कि डॉक्टरों की जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए। मगर इस दिशा में कोई भरोसेमंद प्रावधान नहीं किया गया है। पिछले कुछ सालों में हमारे चिकित्सा तंत्र की साख बहुत तेजी से गिरी है। अनेक योजनाओं के बावजूद आम लोगों को विश्वसनीय चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराना चुनौती बना हुआ है। ऐसे में चिकित्साकर्मियों को निर्भय होकर काम करने का वातावरण देने के साथ-साथ चिकित्सा व्यवस्था को भी भरोसेमंद बनाने पर ध्यान देने की दरकार है।

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