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अपराध की आग

दरअसल, कानूनी हल से इतर शायद ही कभी सामाजिक विकास जैसे मसले सरकारों की प्राथमिकता में शामिल हो पाते हैं। सवाल है कि मनमानी के खिलाफ आवाज उठाने वाली लड़कियां आपराधिक मानसिकता वाले पुरुषों को अपने लिए क्यों खतरा लगती हैं! यह किस तरह का पितृसत्तात्मक प्रशिक्षण है जिसमें बचपन से ही लड़कों के भीतर एक सामंती पुरुष के मनोविज्ञान का विकास होता है, जो बाद में कई बार आपराधिक शक्ल में सामने आता है।

Author Published on: December 25, 2018 3:29 AM
Crime.Molestationप्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

पिछले दस दिनों के भीतर उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से दो अलग-अलग घटनाओं में जिस तरह दो लड़कियों को पेट्रोल डाल कर जला डालने की घटनाएं सामने आई हैं, वे दहला देने वाली हैं। यह समझना मुश्किल है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों की रोकथाम के तमाम सख्त कानूनी उपाय इस तरह की घटनाओं पर काबू पाने में क्यों बेअसर साबित हो रहे हैं। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में बीएससी में पढ़ने वाली एक छात्रा कॉलेज से घर लौट रही थी कि रास्ते में एक युवक ने पहले छेड़छाड़ की कोशिश की। जब लड़की ने उसका विरोध किया तो युवक ने उस पर पेट्रोल फेंक कर आग लगा दी। यही नहीं, युवक ने लड़की की मां को फोन पर बाकायदा अपने किए की सूचना दी। सवाल है कि उसके भीतर इतनी बर्बरता और आपराधिक हिम्मत कहां से आई कि इसके अंजाम का उसके भीतर कोई खौफ नहीं था। इसी तरह, आगरा में भी मोटरसाइकिल पर सवार दो युवकों ने इंटरमीडिएट में पढ़ने वाली एक लड़की को रास्ते में रोक कर जला डाला। दोनों ही मामलों में गंभीर रूप से जलने की वजह से लड़कियों की मौत हो गई।

संभव है कि एक बार फिर इन दोनों घटनाओं को भी बाकी आपराधिक घटनाओं की तरह ही देखा जाए और मुआवजे या फिर कानूनी कार्रवाई के आश्वासन के बाद सब कुछ ठीक हुआ मान लिया जाए। लेकिन सवाल है कि प्रकृति में एक तरह की लगने वाली इन घटनाओं को किस हद तक सामान्य अपराध माना जाए! इन अपराधों को अंजाम देने वाले युवकों के भीतर कानून का खौफ क्यों नहीं था? क्या इसके पीछे यह कारण नहीं हो सकता कि ऐसे हर अपराध के बाद सरकार और प्रशासन की ओर से सख्त कार्रवाई का आश्वासन दोहरा दिए जाते हैं, लेकिन संबंधित घटनाओं के अपराधियों को गिरफ्त में लिया भी जाता है तो सामान्य तौर पर कानून पर अमल की स्थिति ऐसी नहीं होती कि आपराधिक मानस वाले लोगों के मन में उसे लेकर कोई खौफ पैदा हो। यह किसी से छिपा नहीं है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के मामलों में सजा की दर बेहद कम है। इसके अलावा, कानूनी प्रक्रिया की जटिलताओं के चलते यौन उत्पीड़न या हिंसा की बहुत सारी ऐसी घटनाएं तो पुलिस के पास पहुंचती भी नहीं हैं, जिन्हें जघन्य नहीं माना जाता है। हालांकि महिलाओं के खिलाफ होने वाले इस तरह के हर अपराध गंभीर ही होते हैं।

दरअसल, कानूनी हल से इतर शायद ही कभी सामाजिक विकास जैसे मसले सरकारों की प्राथमिकता में शामिल हो पाते हैं। सवाल है कि मनमानी के खिलाफ आवाज उठाने वाली लड़कियां आपराधिक मानसिकता वाले पुरुषों को अपने लिए क्यों खतरा लगती हैं! यह किस तरह का पितृसत्तात्मक प्रशिक्षण है जिसमें बचपन से ही लड़कों के भीतर एक सामंती पुरुष के मनोविज्ञान का विकास होता है, जो बाद में कई बार आपराधिक शक्ल में सामने आता है। यह बेवजह नहीं है कि सख्त कानूनों के बावजूद महिलाओं के खिलाफ बर्बर आपराधिक घटनाओं पर काबू पाना मुश्किल बना हुआ है। जरूरत इस बात की है कि कानूनी तौर पर पूरी सख्ती बरतने के साथ-साथ समाज के ढांचे और सोच को बदलने की एक ठोस प्रक्रिया पर भी काम हो। महिलाओं को अपने बराबर एक व्यक्ति के रूप में स्वीकार करना और उनकी मनाही या इच्छा का सम्मान करना एक पुरुष को सभ्य बनाता है। लेकिन हमारे देश में ऐसे मानस और व्यवहार सामाजिक विकास की परिधि में नहीं आते हैं। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जिस समाज में महिलाओं और कमजोर तबकों के प्रति पर्याप्त सम्मान और संवेदनशीलता का अभाव है, वह सभ्य होने की कसौटी से बहुत दूर है।

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