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संपादकीय: जोखिम में पहरेदार

पिछले कुछ सालों के दौरान पत्रकारों के लिए काम करने का माहौल कैसा रहा है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस साल फिर लोकतंत्र का चौथा खंभा कहे जाने वाले इस स्तंभ के पहरेदारों पर हमलों में तेजी आई है। उन हमलों की शक्लें दबाव और धमकी से लेकर जानलेवा स्तर तक की थीं, जिनमें कई पत्रकारों को जान तक गंवानी पड़ी।

Author Updated: December 21, 2018 3:34 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (AP Photo)

पिछले कुछ सालों के दौरान पत्रकारों के लिए काम करने का माहौल कैसा रहा है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस साल फिर लोकतंत्र का चौथा खंभा कहे जाने वाले इस स्तंभ के पहरेदारों पर हमलों में तेजी आई है। उन हमलों की शक्लें दबाव और धमकी से लेकर जानलेवा स्तर तक की थीं, जिनमें कई पत्रकारों को जान तक गंवानी पड़ी। हालांकि खुद को लोकतांत्रिक कहने वाले देशों के कर्ताधर्ताओं ने अनेक मौकों पर दुनिया को यह आश्वासन दिया कि वे पत्रकारों की सुरक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएंगे, लेकिन उन वादों की हकीकत एक बार फिर रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की ताजा रिपोर्ट में सामने आई है। गौरतलब है कि पेरिस स्थित ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ दुनिया भर में पत्रकारों के लिए काम करने के हालात और उनके जोखिम पर अध्ययन रिपोर्ट पेश करती रही है। हाल ही में आई इसकी एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में इस साल अब तक कम से कम अस्सी पत्रकारों की हत्या कर दी गई। इसके अलावा, न्यूयॉर्क स्थित एक मीडिया निगरानी समूह की रिपोर्ट में भी बताया गया है कि 2018 में पिछले साल की तुलना में जिन पत्रकारों की उनकी रिपोर्टिंग के लिए हत्या कर दी गई, उनकी संख्या पिछले साल के मुकाबले दोगुनी रही।

यह विचित्र विडंबना है कि जिस पत्रकारिता को प्रतिरोध के स्वर के रूप में दुनिया में बेहतरी लाने का जरिया माना जाता है, आज उसके लिए काम करने वाले लोगों के सामने स्थितियां जटिल और खतरनाक हुई हैं। दुनिया भर के पत्रकारों को इस विडंबना का सामना न केवल संबंधित देशों की सत्ताओं, बल्कि दूसरे आपराधिक गिरोहों से लेकर बागी समूहों तक के रुख के कारण भी करना पड़ रहा है। कई बार रिपोर्टिंग करते हुए युद्ध जैसे हालात में भी पत्रकारों की जान चली जाती है। कुछ समय पहले छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई गोलीबारी में दो जवानों के अलावा दूरदर्शन के एक पत्रकार की भी जान चली गई। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में इस साल अब तक करीब साढ़े तीन सौ पत्रकारों को जेल में बंद कर दिया गया, जबकि साठ से ज्यादा को बंधक बनाया गया। वहीं तीन पत्रकार अब भी लापता हैं।

जाहिर है, इतनी बड़ी तादाद में पत्रकार अगर निशाना बनाए जा रहे हैं तो इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि वे दुनिया के अलग-अलग देशों की सत्ताओं और समांतर ताकतों की कारगुजारियों को सामने लाने की हिम्मत कर रहे हैं। पर अफसोस की बात है कि यह स्थिति न केवल दुनिया के कट्टर धार्मिक समूहों के दबदबे या तानाशाही प्रभाव वाले या फिर युद्ध जैसी स्थिति वाले इलाकों में है, बल्कि उन देशों में भी है, जिन्हें लोकतंत्र के लिए एक उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है। मसलन, एक ओर अफगानिस्तान पत्रकारों के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक देश के रूप में सामने आया है, वहीं सीरिया, मैक्सिको और यमन के बाद भारत में भी हालात अलग नहीं हैं। पत्रकारों पर जोखिम के मामले में भारत को दुनिया भर में पांचवां सबसे बुरा देश माना गया है। यहां इस साल यहां छह पत्रकारों की हत्या कर दी गई। कुछ ही दिन पहले मणिपुर में एक पत्रकार को अदालत ने इसलिए साल भर हिरासत में रखने का आदेश दिया कि उसने सरकार के प्रति आलोचनात्मक रुख अख्तियार किया था। भारत के लिए यह खास चिंता की बात इसलिए है कि यहां की लोकतांत्रिक शासन पद्धति और उदार समाज के बीच आमतौर पर विरोधी मतों की अभिव्यक्ति को भी अधिकार के रूप में देखा गया है।

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