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संपादकीय: समांतर डिग्री

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय से यह बहस जारी है कि अगर कोई विद्यार्थी एक सत्र में दो पाठ्यक्रमों की पढ़ाई करना चाहता है तो उसे इसकी इजाजत क्यों नहीं मिलनी चाहिए! लेकिन अब तक इसे एक व्यावहारिक हल नहीं माना गया है और फिलहाल नियमों के मुताबिक एक विद्यार्थी एक शैक्षिक सत्र […]

प्रतिकात्मक चित्र।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय से यह बहस जारी है कि अगर कोई विद्यार्थी एक सत्र में दो पाठ्यक्रमों की पढ़ाई करना चाहता है तो उसे इसकी इजाजत क्यों नहीं मिलनी चाहिए! लेकिन अब तक इसे एक व्यावहारिक हल नहीं माना गया है और फिलहाल नियमों के मुताबिक एक विद्यार्थी एक शैक्षिक सत्र में किसी एक ही पाठ्यक्रम में पढ़ाई कर सकता है और उसी की डिग्री वैध मानी जाएगी। उसे पूरा करने के बाद ही वह किसी अन्य पाठ्यक्रम में दाखिला लेकर उसकी डिग्री ले सकता है। मगर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) अब एक बार फिर इस विचार की व्यावहारिकता का अध्ययन कर रहा है कि विद्यार्थी एक ही या विभिन्न विश्वविद्यालयों से एक साथ अलग-अलग डिग्रियां हासिल कर सकते हैं या नहीं! इस संबंध में यूजीसी ने विश्वविद्यालय या अलग-अलग विश्वविद्यालयों से पत्राचार, ऑनलाइन या अंशकालिक तरीके से एक साथ दो डिग्रियों की पढ़ाई करने के मुद्दे का परीक्षण करने के लिए एक समिति बनाई है। अब देखना है कि इस समिति के निष्कर्ष क्या सामने आते हैं।

गौरतलब है कि करीब सात साल पहले यानी 2012 में यूजीसी ने एक समिति बनाई थी, जिसमें इस मसले पर विचार-विमर्श हुआ था। लेकिन कई स्तरों पर इस विचार को अव्यावहारिक पाया गया था और तब इसे खारिज कर दिया गया था। करीब डेढ़ साल पहले यूजीसी ने साफतौर पर कहा था कि इस बारे में विशेषज्ञों की जो राय आई है, वह विद्यार्थियों को एक साथ दो डिग्री की पढ़ाई करने देने की इजाजत के विचार का समर्थन नहीं करती है। बल्कि अक्सर ऐसी खबरें आती रही हैं कि किसी विद्यार्थी ने या तो जानकारी के अभाव में या फिर चोरी-छिपे एक साथ दो नियमित पाठ्यक्रमों में दाखिला ले लिया, लेकिन बाद में किसी तरह की अड़चन खड़ी होने और जांच होने पर दोनों डिग्रियों की वैधता कठघरे में खड़ी हो गई। इससे इतर 2012 में ही हैदराबाद के तत्कालीन कुलपति फुरकान कमर की अगुआई वाली समिति ने सिफारिश की थी कि नियमित तरीके के तहत भी डिग्री कार्यक्रम में दाखिला पाने वाले विद्यार्थी को उसी या अन्य विश्वविद्यालय से मुक्त या दूरस्थ शिक्षा के जरिए अधिकतम एक अतिरिक्त डिग्री की पढ़ाई की इजाजत दी सकती है।

यानी इस मसले पर पिछले कई सालों से दो समांतर पक्ष रहे हैं। जहां इसे संभव बताने वाले विद्यार्थियों की सुविधा और क्षमता के मद्देनजर उन्हें यह सुविधा मुहैया कराने की वकालत करते रहे हैं, वहीं इसकी व्यावहारिकता को मुश्किल मानने वालों का पक्ष यह है कि एक साथ दो पाठ्यक्रमों की पढ़ाई के दौरान शैक्षिक संस्थान में आने-जाने के अलावा प्रशासनिक और अकादमिक समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। सच यह है कि बढ़ती बेरोजगारी के दौर में समांतर दो डिग्रियां हासिल करने को वक्त की जरूरत के तौर पर देखा जाने लगा है। यानी एक विद्यार्थी अगर अपनी जरूरतों के मद्देनजर या सक्षम होने के नाते एक साथ सुविधा से दो पाठ्यक्रमों की डिग्रियां हासिल करने की कोशिश करना चाहता है तो उसे यह सुविधा मिलनी चाहिए।

कई बार ऐसा होता है कि किसी विद्यार्थी ने कोई पेशेवर पाठ्यक्रम की डिग्री तो हासिल कर ली लेकिन उसके पास स्नातक का प्रमाण-पत्र नहीं होता। नतीजतन, हुनर होने के बावजूद उसका नुकसान हो जाता है और स्नातक के लिए उसे अलग से पढ़ाई करनी पड़ती है। दूसरी ओर, कोई विद्यार्थी स्नातक के साथ कोई पेशेवर पाठ्यक्रम भी पूरा करता है तो उसका काफी कीमती वक्त बच सकता है। इसी हकीकत के मद्देनजर शिक्षाविदों और नीति-निर्माताओं ने दोहरी डिग्री शिक्षा व्यवस्था की वकालत की है। लेकिन अब यह देखने की बात होगी कि यूजीसी की ओर से गठित समिति किस निष्कर्ष पर पहुंचती है।

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