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संपादकीय: दूरसंचार का संकट

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद निजी दूरसंचार कंपनियों के हाथ-पैर फूले हुए हैं।

Author Published on: November 23, 2019 2:57 AM
देश में एक अरब से ज्यादा लोग मोबाइल सेवाओं का उपयोग कर रहे हैं।

देश की प्रमुख निजी दूरसंचार कंपनियों ने आने वाले दिनों में ग्राहकों की जेब ढीली करने के जो संकेत दे दिए हैं, वे निश्चित ही आम लोगों के लिए बड़ा झटका हो सकता है। मोबाइल फोन आज लोगों की सबसे बड़ी जरूरत बन चुके हैं। फोन कॉल से लेकर डाटा और दूसरी अन्य सेवाएं सस्ती से सस्ती दरों पर मुहैया कराने के लिए दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियों के बीच जबर्दस्त होड़ मची है। लेकिन अब ये दिन हवा होते इसलिए लग रहे हैं कि कंपनियां भारी घाटे की मार झेल रही है और फिर हाल में सुप्रीम कोर्ट ने जुर्माना भरने का दबाव और बना दिया है। कुल मिलाकर दूरसंचार क्षेत्र गंभीर संकट में फंस गया है। ऐसे में सवाल यही उठता है कि क्या कंपनियों के पास ग्राहकों की जेब से पैसे निकालने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता है जिस पर विचार हो।

पिछले दो दशक में भारत में निजी दूरसंचार कंपनियों के कारोबार का ग्राफ जिस रफ्तार से बढ़ा है, वह भी कम आश्चर्यजनक नहीं है। हाल में मोबाइल दरें का बढ़ने का मामला तब गरमाया जब पिछली महीने सुप्रीम कोर्ट ने एअरटेल, वोडाफोन-आइडिया और दूसरी दूरसंचार सेवाप्रदाता कंपनियों को बानवे हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का बकाया और लाइसेंस फीस केंद्र सरकार को देने को कहा। इतना ही नहीं, यह बकाया रकम जमा कराने के लिए सिर्फ तीन महीने का वक्त दिया गया है। दूरसंचार विभाग ने भारती एअरटेल, वोडाफोन-आइडिया, आर कॉम और अन्य कंपनियों पर कुल लगभग एक लाख तैंतीस हजार करोड़ के बकाया का दावा किया है जिसमें बानवे हजार करोड़ रुपए लाइसेंस शुल्क और इकतालीस हजार करोड़ रुपए स्पैक्ट्रम शुल्क के बकाया हैं।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद निजी दूरसंचार कंपनियों के हाथ-पैर फूले हुए हैं। माना जा रहा है कि इससे सबसे बड़ा असर तो यह पड़ेगा कि कंपनियां अपने संकट से निपटने के लिए बोझ ग्राहकों पर डालेंगी। सबसे ज्यादा संकट एअरटेल और वोडाफोन-आइडिया पर है। इसीलिए इन कंपनियों ने सबसे पहले शुल्क बढ़ाने के संकेत दिए थे। इसके बाद जियो की तरफ से भी ऐसा ही सुनने को मिला। कंपनियां इस बात को अच्छी तरह समझ रही हैं कि अब लोगों का जीवन पूरी तरह से मोबाइल और इंटरनेट सेवाओं पर निर्भर हो चुका है, ऐसे में लोग सेवाएं लेना तो बंद करेंगे नहीं और दाम बढ़ा कर घाटे और जुर्माने की भरपाई करना ही सबसे आसान विकल्प है। लेकिन अगर कंपनियां इस तरह के संकट को नहीं झेल पाती हैं तो बाजार में इक्का-दुक्का कंपनियों का एकछत्र राज्य हो सकता है और फिर ये कंपनियां ग्राहकों को नचा सकती हैं।

दूरसंचार कंपनियों के बढ़ते संकट को देखते हुए सरकार भी सकते में इसलिए है कि कहीं अचानक इस क्षेत्र से भी कंपनियों के दिवालिया होने या बंद होने जैसी खबरें न आने लगें। इसीलिए सरकार ने फौरी राहत के तौर पर कंपनियों को स्पैक्ट्रम शुल्क दो साल के भीतर किश्तों में जमा कराने की छूट दे दी है। लेकिन कंपनियों के सामने बड़ा संकट यह है कि उन्हें एजीआर यानी समायोजित सकल राजस्व के रूप बानवे हजार से ज्यादा की रकम तो इसी वित्त वर्ष में जमा करानी है। सवाल यह है ये पैसा कहां से लाया जाए। इसलिए कंपनियों को इसका रास्ता ग्राहकों की जेब की ओर ही दिख रहा है। देश में एक अरब से ज्यादा लोग मोबाइल सेवाओं का उपयोग कर रहे हैं। ऐसे में अगर मोबाइल सेवाएं महंगी होती हैं तो यह ग्राहकों के लिए बड़ी मार होगी, वह भी तब जब मंदी से लोगों की कमर टूट रही है।

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