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संपादकीय: जोखिम के स्कूल

दिल्ली से सटे नोएडा में एक स्कूल की दीवार ढहने से हुआ हादसा और उसमें दो बच्चों की मौत स्कूल के प्रबंधकों से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों की घोर लापरवाही का एक और उदाहरण है। यह समझना मुश्किल है कि स्कूल में इस तरह की आपराधिक अनदेखी कैसे कायम थी, जहां करीब तीन सौ बच्चे जान जाने के जोखिम पर रोजाना पढ़ाई करने आ रहे थे।

Author Published on: December 19, 2018 3:29 AM
केएम पब्लिक स्कूल की गिरी दीवार (Express Photo: Abhinav Saha)

दिल्ली से सटे नोएडा में एक स्कूल की दीवार ढहने से हुआ हादसा और उसमें दो बच्चों की मौत स्कूल के प्रबंधकों से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों की घोर लापरवाही का एक और उदाहरण है। यह समझना मुश्किल है कि स्कूल में इस तरह की आपराधिक अनदेखी कैसे कायम थी, जहां करीब तीन सौ बच्चे जान जाने के जोखिम पर रोजाना पढ़ाई करने आ रहे थे। गौरतलब है कि नोएडा के सलारपुर में एक गैर मान्यता प्राप्त न्यू केएम पब्लिक स्कूल में खुले आसमान के नीचे दीवार से सटे जमीन पर बैठ कर चौदह बच्चे परीक्षा दे रहे थे। दीवार की दूसरी तरफ खाली प्लॉट में जेसीबी मशीन से मिट्टी के भराव का काम चल रहा था। मिट्टी का बोझ जब स्कूल की दीवार पर पड़ा तो वह बच्चों के ऊपर ढह गई, जिसमें सात बच्चे दब गए। इससे ज्यादा आपराधिक और क्या हो सकता है कि स्कूल के प्रधानाध्यापक और बाकी शिक्षक जहां बच्चों को बचाने को प्राथमिकता देते, वे सभी अचानक भाग खड़े हुए। स्थानीय लोग अगर मदद के लिए आगे नहीं आते तो शायद उन पांच अन्य बच्चों की जान भी चली जाती, जिन्हें किसी तरह मलबे से निकाल कर अस्पताल पहुंचाया गया।

हादसे के बाद अब प्रशासन ने इस मामले में सभी आरोपियों के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया है और सख्त कार्रवाई की बात कही है। खुद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने हादसे के कारणों की जांच करके उसकी रिपोर्ट मुहैया कराने को कहा है। मगर सवाल है कि सरकार और प्रशासन की ओर से इस तरह की कार्रवाई तभी सामने क्यों आती है, जब ऐसी कोई बड़ी घटना सामने आ जाती है। हैरानी की बात है कि करीब तीन सौ वर्गमीटर में बना यह स्कूल गैर मान्यता प्राप्त था और बिना किसी रोकटोक के चल रहा था। जिस प्रशासन के लिए शहर के किसी कोने में चलने वाली किसी छोटी दुकान के बारे में भी पूरा ब्योरा हासिल करना आसान होता है, उसके सामने यह स्कूल इस स्थिति में चल रहा था कि उसकी दीवारें तक कमजोर थीं। यह भी जांच का विषय है कि मान्यता नहीं होने की वजह से प्रशासन ने इस स्कूल को एक बार बंद कर दिया था, लेकिन फिर छह महीने बाद संचालकों ने नाम बदल कर फिर उसे ही कैसे शुरू कर दिया। इस स्कूल के नाम दो बार बदले गए थे और बुनियादी शिक्षा विभाग ने उसे नोटिस भी दिया था। साफ है कि नियम-कायदों को धता बता कर चलने वाले इस स्कूल की ओर से प्रशासन ने आंखें मूंदी हुई थीं।

दरअसल, जैसे-जैसे सरकारी व्यवस्था के तहत चलने वाले शिक्षा तंत्र का ढांचा कमजोर हुआ है, वैसे-वैसे निजी स्कूलों का जाल खड़ा हो गया है। महानगरों से लेकर शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों तक में कॉन्वेंट के नाम से चलने वाले ऐसे निजी स्कूल आम हैं। लेकिन स्कूल चलाने के लिए जो कसौटियां और अनिवार्य नियम-कायदे हैं, उन पर खरा उतरने वाले स्कूल गिनती के होंगे। भवन, खेल के मैदान, बुनियादी सुविधाएं, कक्षाएं, शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात आदि से संबद्ध सामान्य नियमों की अनदेखी आम है। ऐसे स्कूलों में महज कमाई को केंद्र में रख कर ज्यादा से ज्यादा विद्यार्थियों का दाखिला ले लिया जाता है, लेकिन उनकी पढ़ाई-लिखाई की गुणवत्ता से लेकर उनके खेलने-कूदने और सबसे जरूरी सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी नहीं समझा जाता। यह बेवजह नहीं है कि शिक्षण के इन परिसरों में कई तरह के जोखिम बने रहते हैं। सवाल है कि स्कूल-प्रबंधन की लापरवाही की वजह से जिन दो बच्चों की जान चली गई, उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। क्या इस घटना के बाद सरकार और प्रशासन की नींद खुलेगी?

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