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संपादकीय: नक्सली प्रहार

छत्तीसगढ़ में अगले हफ्ते से मतदान शुरू हो जाएगा। शांतिपूर्ण तरीके से चुनाव संपन्न कराने के मकसद से खासकर वहां के नक्सल प्रभावित इलाकों में भारी पैमाने पर सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं। फिर भी दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट कर एक मिनी बस को उड़ा दिया, जिसमें सुरक्षाकर्मी सहित पांच लोग मारे गए।

Author November 9, 2018 3:06 AM
प्रतीकात्मक फोटो

छत्तीसगढ़ में अगले हफ्ते से मतदान शुरू हो जाएगा। शांतिपूर्ण तरीके से चुनाव संपन्न कराने के मकसद से खासकर वहां के नक्सल प्रभावित इलाकों में भारी पैमाने पर सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं। फिर भी दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट कर एक मिनी बस को उड़ा दिया, जिसमें सुरक्षाकर्मी सहित पांच लोग मारे गए। करीब हफ्ता भर पहले भी बारूदी सुरंग से विस्फोट कर सीआरपीएफ के एक बख्तरबंद वाहन को उड़ा दिया था। यों सुरक्षाबलों का दावा है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की ताकत खत्म हो गई है, वे लगातार सिमट रहे हैं, पर इस तरह थोड़े-थोड़े अंतराल पर उनके घात लगा कर या सुनियोजित तरीके से हमलों को अंजाम देने से इस दावे पर एकबारगी विश्वास नहीं होता। पहली बात तो यह कि नक्सली योजनाओं के बारे में जानकारी हासिल करने में सुरक्षाबल नाकाम साबित हो रहे हैं। कुछ दिनों पहले तर्क दिया गया था कि जिन इलाकों में सड़कों आदि का निर्माण हो रहा होता है, वहां नक्सली बड़ी आसानी से बारूदी सुरंग बिछाने में कामयाब हो जाते हैं। फिर मुख्यमंत्री ने कहा था कि उनके पास बारूदी सुरंगों का पता लगाने के लिए अत्याधुनिक संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, जिससे नक्सली अपने मंसूबों में कामयाब हो जाते हैं।

यह सही है कि जंगली इलाकों में गश्त करना और नक्सली ठिकानों का पता लगाना सुरक्षाबलों के लिए चुनौतीपूर्ण काम है पर उनके बारे में सूचनाएं इकट्ठा करने के लिए जरूरी नहीं कि जंगल की खाक छानी जाए। अत्याधुनिक संचार तकनीक के जरिए भी उनकी टोह ली जा सकती है। लंबे समय से दावा किया जाता रहा है कि छत्तीसगढ़ में तकनीकी मदद से नक्सलियों पर नजर रखी जाएगी। नोटबंदी के बाद कहा गया कि इससे उन्हें हथियार और दूसरे साजो-सामान उपलब्ध कराने वाले रास्ते बंद हो जाएंगे। गृहमंत्री ने दावा भी किया कि नोटबंदी के बाद नक्सलियों और आतंकवादियों की कमर टूट गई है। पर छत्तीसगढ़ में थोड़े-थोड़े अंतराल पर अगर नक्सली हमले हो जा रहे हैं, तो इससे यही साबित होता है कि सुरक्षाबलों के पास जैसी तैयारी और प्रशिक्षण होना चाहिए, वह नहीं है।

दरअसल, लंबे समय से नक्सलियों को हथियार के बल पर दबाने का प्रयास किया जाता रहा है। कुछ साल पहले आदिवासी समुदाय के लोगों को नक्सलियों से लड़ने के लिए तैयार किया गया और सलवा जुडूम नामक अभियान चला कर उम्मीद की गई कि इस तरह नक्सली आंदोलन समाप्त हो जाएगा। पर वह भी नाकाम साबित हुआ। नक्सली समस्या से पार पाने के लिए बातचीत का जो सिलसिला बनना चाहिए, वह अभी तक नहीं बन पाया। स्थानीय लोगों में भरोसा पैदा करने की जरूरत पहले है। आदिवासियों का विरोध विकास के नाम पर छीनी जा रही उनकी जमीन और जंगल को लेकर है। अगर सरकारें उन्हें समझाने में कामयाब हो जाएं कि विकास किसलिए जरूरी है और इससे उनके जीवन में किस तरह के बदलाव आएंगे, तो वे शायद नक्सलियों का साथ देना छोड़ देंगे। इसके अलावा, जहां जल, जंगल, जमीन की रक्षा जरूरी है, वहां सरकार को व्यावहारिक पहलुओं पर विचार करना पड़ सकता है। दमन के सहारे न तो किसी आंदोलन को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है और न किसी के मन को बदला जा सकता है। इसलिए नक्सली आंदोलन पर काबू पाने के लिए सबसे पहले स्थानीय लोगों का विश्वास जीतना जरूरी है। अगर इस दिशा में कामयाबी मिल गई, तो नक्सली ताकतें अपने आप समाप्त हो जाएंगी।

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