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संपादकीय: वादे के साथ

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्ता में आते ही कांग्रेस सरकारों ने अपने यहां किसानों के कर्ज माफ करने की घोषणा कर दी है, जबकि राजस्थान में सरकार ने इस दिशा में काम शुरू कर दिया है। इन तीनों राज्यों में चुनाव के दौरान कांग्रेस ने किसानों से वादा किया था कि सत्ता में आते ही वह सबसे पहले किसानों के कर्ज माफ करेगी।

Author December 19, 2018 3:18 AM
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ। (PTI Photo)

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्ता में आते ही कांग्रेस सरकारों ने अपने यहां किसानों के कर्ज माफ करने की घोषणा कर दी है, जबकि राजस्थान में सरकार ने इस दिशा में काम शुरू कर दिया है। इन तीनों राज्यों में चुनाव के दौरान कांग्रेस ने किसानों से वादा किया था कि सत्ता में आते ही वह सबसे पहले किसानों के कर्ज माफ करेगी। इसलिए कर्ज माफी की घोषणा को उसकी मजबूरी माना जा सकता है। लेकिन यह अच्छी बात इसलिए मानी जानी चाहिए कि चुनाव में किया गया वादा निभाया गया। आमतौर पर राजनीतिक दल चुनावों में जनता से जितने वादे करते हैं, उनमें से ज्यादातर झूठ के पुलिंदे ही साबित होते हैं। किसानों की कर्ज माफी का बोझ सरकारी खजाने पर पड़ता है। इसलिए इसमें सरकारों को बहुत पापड़ बेलने की जहमत नहीं उठानी पड़ती। तीनों राज्यों में किसानों की जो दुर्दशा है, अगर उसमें उन्हें थोड़ी भी राहत मिल जाती है तो निश्चित तौर पर ऐसे प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए।

कर्ज माफी तो न जाने कितनी बार होती रही है, लेकिन फिर भी किसान दयनीय हालत में है। किसान एक बार के कर्ज से मुक्त होता है, लेकिन फसल, उत्पादन और उसकी कीमत का चक्र ऐसा है कि उसे फिर इसकी जरूरत पड़ती है। इस तरह वह इसके दुश्चक्र से बाहर नहीं निकल पाता। अगर किसी भी राजनीतिक दल को किसानों की वाकई चिंता होती तो आजादी के सात दशक बाद भी कुछ हजार रुपए का कर्ज चुकाने के खौफ या फसल तबाह होने के कारण किसान गले में फंदा लगाने को मजबूर नहीं होता। सत्ता में आते ही कई तरह के कर्जों को माफ तो कई सरकारें कर देती हैं, लेकिन किसानों की समस्याओं का स्थायी समाधान निकालने, उसके लिए ठोस नीति बनाने से परहेज करती हैं। उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार ने सत्ता में आने से पहले कर्ज माफी का वादा किया था, लेकिन सारे किसानों को तो इसका फायदा नहीं मिला। ज्यादातर किसान आज भी समस्याओं से घिरे हैं।

पिछले चार सालों के दौरान आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, कर्नाटक, राजस्थान और केरल ने अपने यहां किसानों के कर्ज माफ किए हैं। लेकिन ऐसे किसानों की संख्या आधे से भी कम है जो बैंकों से कर्ज लेते हैं। बैंकों से कर्ज लेने वाले किसान 46.2 फीसद हैं। इसके अलावा 19.8 फीसद किसान स्वयं सहायता समूहों, 16.9 फीसद किसान सूदखोर महाजनों, 22.7 फीसद अपने परिचितों और रिश्तेदारों और 8.8 फीसद किसान अन्य स्रोतों से कर्ज लेते हैं। जाहिर है, ऐसे किसानों की तादाद आधी से भी कम है, जिनका कर्ज सरकार को माफ करना होता है। फिर राज्यों को केवल सहकारी बैंकों का ही कर्ज माफ करने का अधिकार होता है। राष्ट्रीयकृत बैंकों के कर्ज माफ करने के लिए केंद्र से मदद और बजट प्रावधान जैसे उपाय करने पड़ते हैं। ऐसे में बाकी किसानों की कर्ज माफी क्या हो, इस पर कोई नहीं सोचता। हजारों करोड़ की कर्ज माफी राज्यों और देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालती है। इससे अन्य योजनाएं प्रभावित होती हैं।

किसानों की कर्ज माफी को लेकर नीति आयोग, रिजर्व बैंक और अर्थशास्त्री कई बार सवाल उठा चुके हैं। नीति आयोग ने तो हाल में कहा भी कि कर्ज माफी का फायदा एक सीमित वर्ग को ही पहुंचता है। हालांकि कर्ज माफी की योजनाओं से तेलंगाना और केरल जैसे राज्यों में किसानों को मदद भी मिली है। दरअसल, पिछले कुछ दशकों के दौरान खेती के लगातार घाटे का सौदा बनने के क्रम में किसान उत्पादन और बाजार के जिस चक्र में फंस कर बदहाल हो रहे हैं, उसमें सरकार का रुख अहम होगा। ऐसी नीतियां बनानी और लागू करनी होंगी कि किसान कर्ज के दुश्चक्र में न फंसे।

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