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संपादकीय: करतारपुर की राह

पाकिस्तान स्थित गुरद्वारा दरबार साहिब करतारपुर तक जाने का रास्ता साफ हो गया है तो सिख समुदाय के लिए इससे बड़ी खुशी की बात और क्या होगी। सिखों लंबे समय से इसकी मांग कर रहे थे और भारत भी पिछले दो दशकों से इस प्रयास में लगा था। लेकिन पाकिस्तान के भारत विरोधी रवैए के कारण यह मामला परवान नहीं चढ़ पा रहा था।

Author November 24, 2018 2:24 AM
सिखों के लिए करतारपुर का यह गुरद्वारा एक अहम पवित्र स्थान है। (YouTube ScreenShot: Ranvir Virdi)

पाकिस्तान स्थित गुरद्वारा दरबार साहिब करतारपुर तक जाने का रास्ता साफ हो गया है तो सिख समुदाय के लिए इससे बड़ी खुशी की बात और क्या होगी। सिखों लंबे समय से इसकी मांग कर रहे थे और भारत भी पिछले दो दशकों से इस प्रयास में लगा था। लेकिन पाकिस्तान के भारत विरोधी रवैए के कारण यह मामला परवान नहीं चढ़ पा रहा था। अब हालात बदले हैं। गुरुनानक जयंती से ठीक एक दिन पहले भारत सरकार ने फैसला किया कि पंजाब के गुरदासपुर जिले में डेरा बाबा नानक से भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा तक एक गलियारा बनाया जाएगा, ताकि गुरद्वारा साहिब करतारपुर तक जाने का रास्ता बन सके। भारत के फैसले के बाद पाकिस्तान ने भी सद्भाव दिखाया और अपने यहां करतारपुर गुरद्वारे आने वाले श्रद्धालुओं को सारी सुविधाएं देने की बात कही। डेरा बाबा नानक से सीमा तक बनाया जाने वाला यह गलियारा अंतरराष्ट्रीय स्तर का होगा और तीर्थयात्रियों को किसी भी कागजी औपचारिकता के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। सारी सुविधाएं सीमा पर बने केंद्र पर ही मिलेंगी। चुनावी साल के लिहाज से भी सरकार का यह फैसला महत्त्वपूर्ण है। भारत के राष्ट्रपति और पंजाब के मुख्यमंत्री 26 नवंबर को इसकी नींव रखेंगे। ऐसी ही फुर्ती पाकिस्तान ने भी दिखाई है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भी 28 नवंबर को अपने यहां एक समारोह में गुरद्वारे से अंतरराष्ट्रीय सीमा तक गलियारा निर्माण का उद्घाटन करेंगे।

सिखों के लिए करतारपुर का यह गुरद्वारा एक अहम पवित्र स्थान है। अभी तक लोग सीमा के पास से दूरबीनों से ही इसकी झलक भर देख पाते हैं। लेकिन भारत सरकार की ठोस पहल और पाकिस्तान के सकारात्मक रुख से अब सीधे दर्शन हो सकेंगे। पाकिस्तान का यह कदम सिख समुदाय के लिए जितना सुकून देने वाला है, उससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि दोनों देशों के बीच दोस्ती की नई शुरुआत भी हो सकती है। पाकिस्तान का भारत के प्रति जो रुख रहा है उसे देखते हुए यह कल्पना करना मुश्किल था कि वह करतारपुर का रास्ता खोलने के लिए राजी होगा। करतारपुर साहिब तक श्रद्धालुओं को जाने देने का मामला करीब बीस साल से चला आ रहा था। 1999, 2004 फिर 2008 में भारत ने इस मुद्दे को पाकिस्तान के समक्ष उठाया था, लेकिन पाकिस्तानी हुकूमत की हठधर्मिता के कारण सारी कोशिशें बेकार गर्इं। हालांकि लंबे समय तक दोनों मुल्कों के बीच मौखिक तौर इस बारे में बातचीत चलती रही थी कि करतारपुर तक बिना पासपोर्ट-वीजा के श्रद्धालुओं को आने दिया जाए, लेकिन कोई फैसला नहीं हो पा रहा था।

इमरान खान के शपथग्रहण समारोह से लौटने के बाद पंजाब सरकार के मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने दावा किया था कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने उन्हें करतारपुर गलियारा खोलने का संकेत दिया है। हालांकि तब इस मसले पर हंगामा मचा था। लेकिन इन बातों को भुला दिया जाना चाहिए और भारत सरकार के फैसले व पाकिस्तान के सकारात्मक रुख की तारीफ की जानी चाहिए। लंबे समय से भारत और पाकिस्तान के बीच जिस तरह के तनावपूर्ण रिश्ते चले आ रहे हैं, उसे देखते हुए यह वक्त रिश्तों में नई जान फूंक सकता है। यों पाकिस्तान हुकूमत की जैसी फितरत है, उसे देखते हुए उसके किसी भी कदम पर भरोसा करना आसान नहीं है। भारतीय उच्चायोग के राजनयिकों को परेशान करने और उन्हें 21-22 नवंबर को गुरुद्वारा ननकाना साहब और गुरुद्वारा सच्चा सौदा में भारतीय श्रद्धालुओं से मिलने की अनुमति नहीं देने की जो खबरें आई हैं, वे पाकिस्तान की मंशा को उजागर करती हैं। ऐसे में यह देखना होगा कि करतारपुर गलियारा खोलने के बाद क्या पाकिस्तान श्रद्धालुओं कोबिना रोकटोक आने देता है!

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