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संपादकीय: स्वायत्तता की खातिर

गौरतलब है कि हांगकांग अभी चीन का हिस्सा है, मगर वहां ‘एक देश, दो व्यवस्था’ के तहत शासन का संचालन होता है।

Author नई दिल्ली | August 14, 2019 2:31 AM
सांकेतिक तस्वीर।

पछले करीब दो महीने से हांगकांग में विरोध प्रदर्शनों की जो लहर चल रही है, अब उसे थामना वहां के प्रशासन और चीन के लिए मुश्किल होता जा रहा है। सोमवार को हांगकांग हवाई अड्डे पर जिस तरह लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों की भारी तादाद उमड़ आई और इस वजह से विमानों का परिचालन रद्द करना पड़ा, उससे यही लगता है कि ताजा विवाद का कोई हल निकलने के बजाय यह मसला और ज्यादा उलझता जा रहा है। हालत यह है कि प्रदर्शनकारियों ने हांगकांग के हवाई अड्डे पर उतरने वाले यात्रियों का स्वागत किया और इस बीच ‘आजादी के लिए- लड़ाई’ के नारे लगाए।

जाहिर है, हाल में प्रत्यर्पण संधि के सवाल पर उठे विवाद की आंच अब इस रूप में सामने आ रही है कि हजारों लोग आजादी के नारे के साथ सड़क पर हैं। खबरों के मुताबिक, ताजा प्रदर्शन के दौरान लोगों के हाथों में मौजूद तख्तियों पर लिखा था- ‘हांगकांग हमारी हत्या कर रहा है, हांगकांग अब सुरक्षित नहीं रह गया है।’ लेकिन इसके बरक्स चीन ने इस प्रदर्शन के दौरान वहां के पुलिस अधिकारियों पर पेट्रोल बम फेंकने जैसी हिंसा को आतंकवाद से जोड़ा है तो हालात की जटिलता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

गौरतलब है कि हांगकांग अभी चीन का हिस्सा है, मगर वहां ‘एक देश, दो व्यवस्था’ के तहत शासन का संचालन होता है। इसका मतलब यह है कि हांगकांग के पास स्वायत्तता है और चीन के बाकी नागरिकों के मुकाबले इसके नागरिकों के पास कुछ विशेष अधिकार हैं। लेकिन वहां के प्रत्यर्पण बिल में किए गए नए बदलावों की घोषणा के बाद चीन को हांगकांग में किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेकर पूछताछ करने और उसे वापस भेजने को लेकर कई अधिकार प्राप्त हो जाएंगे। बाकी मामलों पर चीन का जो रुख रहा है, उसे देखते हुए ताजा कवायद ने स्वाभाविक ही वहां के लोगों की चिंता को बढ़ा दिया है।

उनका मानना है कि इसके लागू होने के बाद न सिर्फ यहां के लोगों पर चीन का कानून लागू हो जाएगा, बल्कि यह सीधे तौर पर हांगकांग की स्वायत्तता को भी प्रभावित करेगा। हालांकि चीन का ऐसे मामलों में जो रिकार्ड रहा है, उसे देखते हुए इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस कानून के अस्तित्व में आने के बाद शक के घेरे में आए लोगों को मनमाने आरोपों के तहत गिरफ्तार और प्रताड़ित किया जाए।

यों वहां सरकार ने यह आश्वासन देने की कोशिश की है कि प्रत्यर्पण से संबंधित इस कानून के तहत सिर्फ गंभीर और आपराधिक मामलों के अभियुक्तों को चीन भेजा जाएगा और इसके लिए भी हांगकांग के एक जज की मंजूरी अनिवार्य होगी, लेकिन स्थानीय लोग इसे राजनीतिक विरोधियों को ठिकाने लगाने के औजार के तौर पर देख रहे हैं। इसी क्रम में बारह जून को हुए विशाल प्रदर्शन के बाद एक जुलाई को आंदोलनकारियों ने कई घंटों तक संसद की इमारत को अपने कब्जे में रखा था।

जाहिर है, खासतौर पर संसद भवन को नुकसान पहुंचाने को चीन ने अपने लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में देखा और इसे ‘एक देश, दो व्यवस्था’ के सिद्धांत का उल्लंघन करार दिया। हांगकांग में लोकतंत्र के पक्ष में 2014 में उनयासी दिनों तक ‘अंब्रेला मूवमेंट’ चला था और उसके बाद चीन की सरकार ने उसमें भाग लेने वाले कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई की थी। उसके बाद लोकतंत्र के हक में उठी ताजा आवाज पर भी चीन का जो रुख है, उससे साफ है कि प्रत्यर्पण बिल के सवाल से शुरू हुए इस आंदोलन को भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

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