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संपादकीय: अंधविश्वास की जड़ें

महाराष्ट्र में पुणे जिले से एक महिला और उसके पति की हत्या की जैसी घटना सामने आई है, वह केवल आपराधिक घटनाओं पर काबू पाने में सरकारी नाकामी का मामला नहीं है। इससे यह भी साफ होता है कि सोच और चेतना के स्तर पर हमारा समाज आज भी किस स्तर पर जड़ता से ग्रस्त है और उसके नतीजे में कैसे लोग हत्या तक करने से नहीं हिचकते।

Author November 10, 2018 2:31 AM
प्रतीकात्मक फोटो

महाराष्ट्र में पुणे जिले से एक महिला और उसके पति की हत्या की जैसी घटना सामने आई है, वह केवल आपराधिक घटनाओं पर काबू पाने में सरकारी नाकामी का मामला नहीं है। इससे यह भी साफ होता है कि सोच और चेतना के स्तर पर हमारा समाज आज भी किस स्तर पर जड़ता से ग्रस्त है और उसके नतीजे में कैसे लोग हत्या तक करने से नहीं हिचकते। पुणे के औंधे गांव में कुछ लोगों ने मान लिया कि वहां की एक महिला जादू-टोना और काले जादू करती है। इसी शक में उस महिला और उसके पति पर हमला कर दिया और धारदार हथियारों से मार डाला। हमला करने वाले एक व्यक्ति की बेटी के पेट में गांठ बन गई थी और उसके लिए वह उस महिला के काले जादू का असर मानता था। हालांकि पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन यह घटना अपने आप में बताने के लिए काफी है कि विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच हमारे समाज में बहुत सारे लोग वैज्ञानिक चेतना के अभाव में किस कदर किसी बीमारी के कारण पर विचार करने की स्थिति में नहीं पहुंच सके हैं।

यह एक जगजाहिर तथ्य है कि ऐसे अंधविश्वासों की वजह से देश भर में कितने लोगों और खासकर महिलाओं को त्रासद उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। तांत्रिक या ओझा के बहकावे में आकार किसी महिला को डायन या काला जादू करने वाली बताने, उसे मैला पिलाने, निर्वस्त्र करके घुमाने और हत्या तक कर देने की खबरें अक्सर आती रहती हैं। विडंबना है कि ऐसे अंधविश्वासों में पड़े लोगों को यह भी अहसास नहीं होता कि भ्रम में पड़ कर वे अपराध कर रहे हैं। कई बार धार्मिक परंपरा का नाम देकर ऐसी धारणाओं का बचाव किया जाता है। देश के कुछ राज्यों में जब अंधविश्वास के खिलाफ कानून बनाने की कोशिशें की जा रही थीं, तो उसके विरोध के लिए धार्मिक पक्ष और मान्यताओं का ही हवाला दिया गया था। साफ है कि अंधविश्वासों के बने रहने में कुछ लोग अपना हित समझते हैं और इसीलिए वैज्ञानिक सोच के बजाय वे भ्रम पर आधारित परंपराओं को बढ़ावा देने में लगे रहते हैं।

महाराष्ट्र में अंधविश्वास विरोधी आंदोलन और जागरूकता अभियानों की कमी नहीं रही है। इसके बावजूद आज भी अगर देश में कहीं भी जादू-टोना या अंधविश्वास पर आधारित मान्यताओं की वजह से किसी की हत्या कर दी जाती है तो यह सोचने की जरूरत है कि व्यवस्थागत रूप से सामाजिक विकास के किन पहलुओं की अनदेखी की गई है। भारतीय संविधान की धारा 51-ए (एच) के तहत वैज्ञानिक दृष्टि के विकास और जरूरत को नागरिकों को बुनियादी कर्तव्य के रूप में रेखांकित किया गया है। पर आजादी से बाद से अब तक सरकारों की ओर से शायद ही कभी इस मकसद से कोई ठोस पहलकदमी की गई या वैज्ञानिक चेतना के विकास, उसके प्रचार-प्रसार को मुख्य कार्यक्रमों में शामिल किया गया। नतीजतन, परंपरागत तौर पर जिस रूप में अंधविश्वास समाज में चलता आया है, लोग उससे अलग कुछ सोचने की कोशिश नहीं करते। जरूरत इस बात की है कि न केवल सामाजिक संगठनों, बल्कि खुद सरकार की ओर से भी शिक्षा-पद्धति में अंधविश्वासों के खिलाफ पाठ शामिल करने के साथ-साथ व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जाएं। अन्यथा अंधविश्वास की वजह से पुणे में पति-पत्नी की हत्या की तरह की घटनाएं हमारे तमाम विकास पर सवाल उठाती रहेंगी।

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