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संपादकीयः मलेशिया का संकट

मलेशिया की राजनीति में वे पिछले चालीस सालों से केंद्र में बने रहे हैं। दो साल पहले उन्होंने विभिन्न दलों का गठबंधन बना कर करीब पंद्रह सालों से सत्ता में बनी रही भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार को शिकस्त दी थी।

Author Edited By Anil Sharma Published on: February 26, 2020 12:32 AM
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मलेशियाई प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद के अचानक इस्तीफा सौंपने से देश में राजनीतिक संकट गहरा गया है। गठबंधन ‘पैक्ट ऑफ होप’ के तहत महातिर मोहम्मद ने वादा किया था कि वे एक समय के बाद अनवर इब्राहीम को सत्ता सौंप देंगे। मगर गठबंधन में शामिल कुछ दल और खुद महातिर मोहम्मद की पार्टी बरसातू के कुछ नेता नहीं चाहते थे कि अनवर प्रधानमंत्री का पद संभालें। उन्हें सत्ता से दूर रखने के प्रयास में प्रतिद्वंद्वी और विपक्षी दलों ने मिल कर एक नया गठबंधन बनाने का प्रयास किया। बताते हैं कि इससे क्षुब्ध होकर महातिर मोहम्मद ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे से कुछ देर पहले उनकी पार्टी बरसातू ने भी अपने को गठबंधन से अलग कर लिया था। इससे यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि महातिर नए गठबंधन के जरिए फिर से सत्ता में आ सकते हैं। महातिर मोहम्मद दुनिया के कुछ बेलाग नेताओं में गिने जाते हैं। वे जो कहते हैं, उस पर कायम भी रहते हैं। मलेशिया की राजनीति में वे पिछले चालीस सालों से केंद्र में बने रहे हैं। दो साल पहले उन्होंने विभिन्न दलों का गठबंधन बना कर करीब पंद्रह सालों से सत्ता में बनी रही भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार को शिकस्त दी थी। इस तरह महातिर सरकार से वहां के लोगों को काफी उम्मीदें थीं। मगर अब उनके प्रधानमंत्री पद से हट जाने के बाद वहां राजनीतिक अनिश्चितता का माहौल है।

हालांकि कुछ बातों को लेकर महातिर सरकार से कुछ लोग नाराज भी चल रहे थे। एक तो यह कि मलेशियाई मूल के लोग अपेक्षा कर रहे थे कि महातिर सरकार मलय अधिकारों के संरक्षण को लेकर कोई व्यावहारिक नीति बनाएगी, पर यह इसलिए नहीं हो पाया कि वहां करीब चालीस फीसद लोग भारतीय और चीनी मूल के भी हैं और वहां के कारोबार आदि पर उनकी अच्छी पकड़ है। फिर भी महातिर मोहम्मद लगातार प्रयास करते रहे कि मलेशियाई मुसलिम समुदाय के लोगों को संतुष्ट रख सकें। शायद इसी प्रयास में उन्होंने भारत सरकार द्वारा कश्मीर से अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटाए जाने और फिर नागरिकता संशोधन कानून पर सख्त टिप्पणी की थी। हालांकि उनके बयानों का वहां के मुसलिम समुदाय पर कोई सकारात्मक असर तो नहीं दिखा, पर देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान जरूर उठाना पड़ा। भारत ने मलेशिया से पाम आयल यानी ताड़ के तेल का आयात रोक दिया। मलेशिया ताड़ के तेल का सबसे बड़ा निर्यातक है और भारत उसका सबसे बड़ा खरीदार। इस तरह भारत के फैसले से वहां के सामान्य लोगों पर भी सीधा असर नजर आने लगा।

हालांकि भारत से रिश्ते कड़वे होने के बाद मलेशिया ने चीन और पाकिस्तान से नजदीकी बढ़ाई, पर वहां के कारोबारियों को इससे कोई लाभ नहीं हुआ। भारतीय मूल के कई कारोबारी परदे के पीछे से पाम आयल की खरीद बरकरार रखने के लिए भारत सरकार से अपील करते रहे। इस तरह महातिर मोहम्मद से कुछ नाराजगी उनके भारत से संबंध खराब करने की वजह से भी थी। अब वहां जो नया राजनीतिक समीकरण बन रहा है, वह मलेशिया के लिए और चिंताजनक कहा जा सकता है। अनवर को सत्ता से दूर रखने के लिए जो नया गठबंधन बनाने का प्रयास हो रहा है, उसमें यूनाइटेड मलय नेशन आर्गनाइजेशन के नेता नजीब रज्जाक सबसे आगे दिख रहे हैं। उन पर भ्रष्टाचार के बड़े आरोप हैं। अगर उनकी पार्टी वहां सत्ता में आती है, तो मलेशिया का संकट निस्संदेह गहरा सकता है।

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