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संपादकीयः भर्ती में मनमानी

हरियाणा में यह पहली घटना नहीं है। पहले भी सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की भर्ती में बड़े पैमाने पर हुई अनियमितता की शिकायत मिलने पर अदालत ने उसे रद्द कर दिया था। उसमें कई रसूख वाले राजनेताओं को सजा भी मिली थी। इस तरह के मामले उत्तर प्रदेश में भी पुलिस और शिक्षकों की भर्ती में उठ चुके हैं।

Author Published on: April 10, 2020 12:15 AM
भर्तियों में बड़े पैमाने पर अनियमितता की शिकायतें मिलने के बाद उन्हें रद्द किया जा चुका है।

सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया में पक्षपात, रिश्वत, रसूख, सिफारिश वगैरह का बोलबाला छिपी बात नहीं है। यहां तक कि आरक्षण वाले पदों पर भी इसका प्रभाव देखा जाता है। अनेक जगहों पर भर्तियों में बड़े पैमाने पर अनियमितता की शिकायतें मिलने के बाद उन्हें रद्द किया जा चुका है। हरियाणा में शारीरिक प्रशिक्षकों की भर्ती में हुई अनियमितता के कारण उन्हें रद्द किया जाना इसका ताजा उदाहरण है। करीब चौदह साल पहले इसके लिए आवेदन मंगाए गए थे और फिर चयन प्रक्रिया के बाद दस साल पहले करीब दो हजार प्रशिक्षकों की नियुक्ति कर दी गई थी। उस चयन प्रक्रिया में धांधली की शिकायत की गई, जिस पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने पूरी भर्ती को रद्द करने का आदेश दिया था। उस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। अब सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए सभी भर्तियों को रद्द कर इन पदों के लिए नए सिरे से चयन प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया है। इस तरह जो लोग पिछले दस सालों से नौकरी कर रहे थे, उन्हें भी नए सिरे से आवेदन करना और चयन प्रक्रिया में शामिल होना पड़ेगा। गनीमत है, अदालत ने इन पदों पर काम कर रहे लोगों से पैसे वसूलने का आदेश नहीं दिया है।

हरियाणा में यह पहली घटना नहीं है। पहले भी सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की भर्ती में बड़े पैमाने पर हुई अनियमितता की शिकायत मिलने पर अदालत ने उसे रद्द कर दिया था। उसमें कई रसूख वाले राजनेताओं को सजा भी मिली थी। इस तरह के मामले उत्तर प्रदेश में भी पुलिस और शिक्षकों की भर्ती में उठ चुके हैं। छिपी बात नहीं है कि जो भी राजनीतिक दल सत्ता में आता है, वह सरकारी नौकरियों में अपने नजदीकी लोगों को भरने का प्रयास करता है। जबसे कुछ राजनीतिक दलों ने अपना आधार जातीय समीकरण पर बना लिया है, उनके सत्ता में आने पर सरकारी भर्तियों में उन जातियों के लोगों की बहुलता स्पष्ट नजर आती है। हालांकि हर नौकरी के लिए न्यूनतम अर्हता और योग्यता तय होती है, पर जिस तरह चपरासी जैसे पदों के लिए लाखों ऊंची डिग्री वाले लोग भी आवेदन करते देखे जाते हैं, उसमें वही कामयाब हो पाते हैं, जिनकी पहुंच चयन प्रक्रिया में शामिल या सत्ता के निर्णायक पदों का निर्वाह कर रहे लोगों तक हो। इस तरह राजनीतिक दल अपना जनाधार मजबूत करने और चुनाव आदि के लिए धन जमा करते भी देखे जाते हैं।

कई बार सरकारी नौकरियों की चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के उपायों पर जोर दिया जाता है, पर जब सत्ता पक्ष खुद अनियमितताओं में शामिल हो, तो किसी भी उपाय की कोई अहमियत नहीं रह जाती। हरियाणा में शारीरिक प्रशिक्षकों की भर्तियों में भी तत्कालीन सरकार की पक्षपातपूर्ण भूमिका चिह्नित हुई है। राजनीतिक दलों और सत्ता पक्ष के जिम्मेदार लोगों की इस प्रवृत्ति के चलते ही आम लोगों में यह विश्वास बन चला है कि बिना सिफारिश के सरकारी नौकरी नहीं मिलती। हालांकि ऊंचे पदों की भर्ती के लिए राज्यों के लोक सेवा आयोग हैं, जो प्रतियोगी परीक्षाएं आयोजित करते हैं, पर उनमें भी साक्षात्कार के समय पक्षपात की शिकायतें आम हैं। जब तक इस प्रवृत्ति पर काबू करने के पुख्ता इंतजाम नहीं होते, तब तक न तो वास्तविक रूप से हकदार युवाओं को सरकारी नौकरियों में जगह मिल पाएगी और न प्रशासन में सुधार आएगा।

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