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संपादकीय: गहराता संकट

दिल्ली और आसपास के शहरों में प्रदूषण लंबे समय से एक गंभीर समस्या बना हुआ है। इस पर काबू पाने के लिए अब तक जितने भी उपाय किए गए, वे या तो जमीन पर नहीं उतरे या फिर तात्कालिक आश्वासन भर बन कर रह गए।

Author November 9, 2018 3:17 AM
प्रतीकात्मक फोटो

संपादकीय: गहराता संकटदिल्ली और आसपास के शहरों में प्रदूषण लंबे समय से एक गंभीर समस्या बना हुआ है। इस पर काबू पाने के लिए अब तक जितने भी उपाय किए गए, वे या तो जमीन पर नहीं उतरे या फिर तात्कालिक आश्वासन भर बन कर रह गए। पिछले कई सालों से दिवाली के मौके पर होने वाले प्रदूषण को लेकर व्यापक स्तर पर चिंता जताई जाती रही है पर स्थिति और बिगड़ती गई है। इस चुनौती से जूझने के क्रम में इस साल सुप्रीम कोर्ट ने सख्त निर्देश दिए थे कि दिल्ली में दिवाली के दिन सिर्फ दो घंटे यानी रात आठ से दस बजे तक पटाखे फोड़े जा सकेंगे। इससे यह उम्मीद जरूर बंधी थी कि लोग कम से कम शीर्ष अदालत के निर्देशों पर अमल करेंगे। पर इसे याद रखना जरूरी नहीं समझा गया और लोगों ने जम कर आतिशबाजी की। हालांकि पटाखे फोड़ने के मामले में अन्य सालों की अपेक्षा मामूली कमी देखी गई, लेकिन यह इतनी भी नहीं रही कि उसे कोई बड़ी उपलब्धि मानी जाए। यही वजह रही कि दिवाली के अगले रोज दिल्ली धुएं और कोहरे की चादर में लिपटी दिखी और सांस लेने में तकलीफ की शिकायत आम पाई गई।

पिछले कुछ दिनों से भारी वायु प्रदूषण की चपेट में आ चुकी दिल्ली में दिवाली के मौके पर प्रदूषण में बढ़ोतरी की वजह से हवा और ज्यादा जहरीली हो गई। गुरुवार की सुबह यहां का एक्यूआइ यानी औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक 374 तक पहुंच गया था, जो बेहद खराब माना जाता है। दिल्ली में कई जगहों पर तो यह आंकड़ा 999 तक पहुंच गया, जिसे खतरनाक से ऊपर माना जाता है। हैरानी की बात है कि इस जोखिम को जानते-समझते हुए भी आम लोग उसे कम करने में अपनी मामूली भूमिका निभाने के बजाय लापरवाही की हद पार करते नजर आते हैं। सवाल है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने पटाखे फोड़ने पर कोई दिशा-निर्देश जारी किया था, तो वह किसके हित में था! अगर पहले ही हवा में घुले प्रदूषक तत्त्व खतरे के निशान पार कर चुके हों तो उससे उपजी समस्या को और गंभीर बनाने के बारे में कौन सोच सकता है? अदालत ने हरित पटाखे फोड़ने को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया था। पर न तो हरित पटाखे सहज उपलब्ध हैं, न लोगों को उनके बारे में अभी ठीक से पता है। इनकी सहज उपलब्धता की जिम्मेदारी किसकी बनती है?

दरअसल, शायद सारी समस्या जागरूकता और नागरिक जिम्मेदारी निभाने के अभाव की है। यह समझना मुश्किल है कि साल के जिन महीनों के दौरान प्रदूषण की समस्या से निपटने में हवा के दबाव की वजह से मौसम भी प्रतिकूल भूमिका में होता है, उसमें लोग अपनी सेहत और जीवन की सुरक्षा को लेकर सक्रिय क्यों नहीं होते! यह तथ्य है कि दिल्ली की हवा में जहर घुलने की एक बड़ी वजह यहां की सड़कों पर दौड़ने वाले निजी वाहन हैं। पर कुछ दिनों के लिए भी लोग अपनी आम सुविधा में कमी करके सार्वजनिक वाहनों का इस्तेमाल करना जरूरी नहीं समझते। इसके समांतर यह भी सच है कि सरकार ने शायद ही कभी सार्वजनिक परिवहन के तंत्र को इतना मजबूत और सुविधाजनक करने की कोशिश की, ताकि लोग निजी वाहनों का प्रयोग कम करें। क्या सरकार और जनता के इस रवैये के साथ गैस चेंबर में तब्दील होते इस शहर में प्रदूषण की समस्या से निजात पाने का सपना देखा जा सकता है?

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