संपादकीय: संकट और सवाल

कर्नाटक में राजनीतिक संकट की नींव विधानसभा चुनाव नतीजों के साथ ही पड़ गई थी। यह तभी तय हो गया था कि जो भी सरकार होगी, वह जोड़-तोड़ के सहारे ही चलेगी। विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की वजह से ये स्थिति बनी थी।

H D KumaraswamyKarnataka Floor Test Live: कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी विधानसभा सत्र के दौरान अपनी कुर्सी पर बैठे हुए। (पीटीआई फोटो)

कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली जद (सेकु)-कांग्रेस गठबंधन सरकार सदन में विश्वासमत हासिल नहीं कर पाई और आखिरकार गिर गई। अब नई सरकार का गठन भी हो जाएगा। लेकिन राज्य में पिछले साल मई में विधानसभा चुनाव के बाद से, खासतौर पर पिछले बीस-पच्चीस दिनों में जिस तरह का घटनाक्रम चला है, वह लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न तो है ही। गठबंधन सरकार में मंत्रियों की नाराजगी, विधायकों का बागी होना, मंत्री पद के लिए दबाव की राजनीति, मंत्रियों और विधायकों के इस्तीफे, मामले को फंसाए रखने के लिए अदालत का सहारा लेना और कानूनी दांवपेच के जरिए संकट को और बढ़ाने जैसे जितने भी घटनाक्रम देखने को मिले, उन सबसे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब हमारे जनप्रतिनिधि आपस में लड़ने और सिर्फ सत्ता हथियाने की जुगत में लगे रहेंगे तो सरकारें जनता के लिए काम क्या करेंगी, विकास संबंधी काम कैसे होंगे, सरकारें कैसे जन-आकांक्षाओं पर खरी उतरेंगी? इस तरह की उठापटक की राजनीति के बीच कर्नाटक में पिछले एक साल में सरकार ने क्या कोई ऐसा उल्लेखनीय काम किया जो सीधे जनता के हितों से सरोकार रखता हो? क्या यही स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है?

कर्नाटक में राजनीतिक संकट की नींव विधानसभा चुनाव नतीजों के साथ ही पड़ गई थी। यह तभी तय हो गया था कि जो भी सरकार होगी, वह जोड़-तोड़ के सहारे ही चलेगी। विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की वजह से ये स्थिति बनी थी। शुरू में भाजपा विधायक दल के नेता येदियुरप्पा मुख्यमंत्री तो बन गए थे लेकिन छह दिन बाद वे भी विश्वासमत हासिल नहीं कर पाए थे। उसके बाद कांग्रेस के समर्थन से जद(सेकु) के एचडी कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने। हाल में संकट तब खड़ा हुआ जब छह जुलाई को कांग्रेस के नौ और जद (सेकु) के तीन विधायक बागी हो गए और विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफे सौंप दिए। इसके दो दिन बाद सभी मंत्रियों ने भी अपने-अपने पार्टी नेताओं को इस्तीफे थमा दिए। मंत्री पद पर रहे दो निर्दलीय विधायकों ने भी इस्तीफा देकर भाजपा के साथ जाने का एलान कर दिया। संकट तब और गहरा गया जब सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश में यह कह दिया कि पंद्रह बागी विधायकों को सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। ऐसे में सवाल यह खड़ा हो गया कि तब पार्टी व्हिप का क्या मतलब रह जाएगा! अगर कोई विधायक पार्टी व्हिप का उल्लंघन करता है तो क्या होगा?

कुमारस्वामी ने 18 जुलाई को विश्वासमत पेश किया था। राज्यपाल ने बहुमत साबित करने के लिए तीन बार समय सीमा तय की, लेकिन विश्वासमत नहीं हो पाया। मंगलवार शाम विश्वासमत पर हुए मतदान में कुमारस्वामी सरकार के समर्थन में निन्यानवे और विरोध में एक सौ पांच वोट पड़े। सवाल है, अब आने वाले दिनों में क्या होगा? जैसे हालात हैं उसमें तो यही लग रहा है कि जिस संकट का सामना कुमारस्वामी को करना पड़ा, नए मुख्यमंत्री भी उससे बचे नहीं रहेंगे। अगली सरकार भी चुनिंदा विधायकों की मेहरबानी पर टिकी होगी। इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर आरोप विधायकों की खरीद-फरोख्त को लेकर लगे हैं। सरकारें गिराने-बनाने के खेल में विधायकों की खरीद-फरोख्त कोई नई बात नहीं है। पैसे और पद के लालच में जनप्रतिनिधि किस तरह से अपने ‘अंतर्मन की आवाज’ पर फैसले करते हैं और ‘नैतिकता’ की दुहाई देते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके ‘अंतर्मन की आवाज’ मतदाता के साथ एक बड़ा विश्वासघात है। जनप्रतिनिधियों का ऐसा चरित्र जनादेश का अपमान होता है। कर्नाटक में यही हुआ है।

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