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संपादकीयः जांच की कीमत

राज्य सरकारें गरीबों को आर्थिक मदद और भोजन संबंधी सुविधाएं मुहैया करा रही हैं। संक्रमितों की पहचान के लिए प्रयास भी पर्याप्त हो रहे हैं। इसी तरह जांच के मामले में भी अगर सरकारें थोड़ी उदारता और बरतें, इसे मुफ्त कराने की व्यवस्था करें, तो निस्संदेह संक्रमितों की पहचान और उनके इलाज में तेजी आएगी।

जिस तरह हर रोज संक्रमितों की संख्या बढ़ रही है, उसमें सबसे जरूरी है कि जांच में तेजी लाई जाए।

इस वक्त सारा देश कोरोना विषाणु के संक्रमण का चक्र तोड़ने के हर उपाय आजमा रहा है, फिर भी इस पर काबू पाना मुश्किल बना हुआ है। मांग की जा रही है कि लोगों की जांच में तेजी लाई जाए, पर संसाधनों की कमी के चलते सरकारें इस दिशा में गति नहीं बढ़ा पा रहीं। ऐसे में कुछ निजी प्रयोगशालाओं को भी जिम्मेदारी दी गई है कि वे कोरोना विषाणु की जांच कर सकती हैं। पहले देश में एक सौ अठारह प्रयोगशालाएं प्रति दिन पंद्रह हजार नमूनों की जांच कर पा रही थीं, अब सैंतालीस और निजी प्रयोगशालाओं को जांच करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। सरकार ने इस जांच की फीस भी तय कर दी है कि कोई भी प्रयोगशाला इस जांच के लिए साढ़े चार हजार रुपए से अधिक फीस न वसूले। पर यह फीस गरीब तो क्या, मध्य वित्तवर्ग के बहुत सारे लोगों के लिए भी भारी रकम है। इसलिए एक याचिका में सुप्रीम कोर्ट के सामने गुहार लगाई गई थी कि इस जांच का पैसा सरकारें अदा करें। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया है कि वह निजी प्रयोगशालाओं पर नजर रखे, ताकि वे मनमानी फीस न वसूलने पाएं।

जिस तरह हर रोज संक्रमितों की संख्या बढ़ रही है, उसमें सबसे जरूरी है कि जांच में तेजी लाई जाए और अधिक से अधिक लोगों के नमूने लिए जाएं। इस तरह संक्रमितों की पहचान जल्दी होगी और उन्हें अलग-थलग कर दूसरों में संक्रमण फैलने से रोका जा सकेगा। पर स्थिति यह है कि सरकारी प्रयोगशालाओं की क्षमता इतनी नहीं है कि वे हर रोज लाखों लोगों की जांच कर सकें। फिर ये प्रयोगशालाएं कुछ शहरों में स्थित हैं, इसलिए दूर-दराज के गांवों-कस्बों के लोगों की जांच कर पाना कठिन काम बना हुआ है। ऐसे में निजी प्रयोगशालाओं के सहयोग से जांच में तेजी लाने का सरकार का प्रयास कारगर साबित हो सकता है। हालांकि गरीब लोगों को इसकी जांच और इलाज वगैरह का खर्च उठाने में दिक्कत न पेश आए, इसके लिए आयुष्मान भारत योजना से इसे जोड़ दिया गया है। यानी इस योजना में पंजीकृत लोग निजी अस्पतालों में भी जांच और इलाज करा सकेंगे, जिसका खर्च सरकार उठाएगी। पर हकीकत यह है कि अब भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जो आयुष्मान भारत योजना में पंजीकृत नहीं हैं। उन्हें इस सुविधा का लाभ नहीं मिल पाएगा। ऐसे में इस महामारी से आशंकित या प्रभावित बहुत सारे लोगों के सामने जांच की रकम चुकाने की चिंता स्वाभाविक है।

राज्य सरकारें गरीबों को आर्थिक मदद और भोजन संबंधी सुविधाएं मुहैया करा रही हैं। संक्रमितों की पहचान के लिए प्रयास भी पर्याप्त हो रहे हैं। इसी तरह जांच के मामले में भी अगर सरकारें थोड़ी उदारता और बरतें, इसे मुफ्त कराने की व्यवस्था करें, तो निस्संदेह संक्रमितों की पहचान और उनके इलाज में तेजी आएगी। इस समय चिंता यह है कि संक्रमण सामुदायिक स्तर पर न पहुंचने पाए। इसके लिए सामाजिक दूरी बनाए रखने के कड़े उपाय किए गए हैं। पर सही अर्थों में यह तभी संभव होगा जब जांच में तेजी आए। दिल्ली सरकार ने तेज गति से और सभी लोगों तक जांच अभियान की पहुंच सुनिश्चित करने की वचनबद्धता दोहराई है। अन्य राज्य सरकारें भी इस दिशा में तेजी लाने का प्रयास करें, तो जल्दी स्थिति में सुधार की सूरत बनेगी। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर सरकारों को इस दिशा में मुस्तैदी दिखाने की जरूरत है।

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