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संपादकीय: मुसीबत की बरसात

नदियों में कचरे के प्रवाह को रोकने की अब तक की तमाम योजनाएं विफल साबित हुई हैं। नदियों के पाटों पर अतिक्रमण रोकने में प्रशासन नाकाम रहा है। इसी तरह शहरों में बढ़ती आबादी के मुताबिक नागरिक सुविधाएं जुटाने और गैरकानूनी तरीके से बसती बस्तियों पर नजर रखने में लापरवाही का आलम है।

Author July 30, 2018 1:27 AM
यमुना का जलस्‍तर लगातार बढ़ रहा है। (Photos : ANI)

पिछले हफ्ते तीन दिनों तक लगातार बारिश क्या हुई, देश के विभिन्न शहरों में जैसे मुसीबत आ गई। दिल्ली में जगह-जगह जलभराव की वजह से लोगों का घरों से बाहर निकलना मुश्किल हो गया, तो आसपास के इलाकों में कई मकान धराशायी हो गए। यमुना उफन कर खतरे के निशान को छू गई। उत्तर प्रदेश में बाढ़ और मकान गिरने से करीब पैंसठ लोग मारे गए। बिहार की राजधानी पटना शहर में बाढ़ का पानी भर गया। वहां के नालंदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष समेत तमाम कमरों में घुटनों तक पानी भर गया। उसमें मछलियां तैरती देखी गईं। इससे मरीजों और उनके तीमारदारों में नई बीमारियां फैलने की आशंका पैदा हो गई। पटना में मुख्यमंत्री निवास के करीब काफी दूर तक सड़क धंस गई। बारिश की वजह से पैदा हुई इन परेशानियों से स्वाभाविक ही एक बार फिर शहरी नियोजन, जल निकासी प्रबंधन और बाढ़ जैसी स्थिति से निपटने संबंधी तैयारियों पर सवाल उठने लगे हैं। यह लगभग हर साल की स्थिति है। जब भी सामान्य से कुछ अधिक बारिश होती है, जलभराव से शहरों में स्थिति विकट हो जाती है।

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ऐसा नहीं कि इन दिनों बारिश कुछ अधिक होने लगी है। बीस-पच्चीस साल पहले तक अब से कुछ अधिक ही बारिश होती थी। कई दिन तक बरसात की झड़ी लगी रहती थी, मगर तब शहरों में ऐसी स्थिति प्राय: कम ही देखी जाती थी। पिछले कुछ सालों से शहरों के विस्तार और आधुनिकीकरण पर जोर है, विदेशों की नकल पर गगनचुंबी इमारतें बनने लगी हैं, उनमें अत्याधुनिक तकनीक और सुविधा सामग्री का उपयोग होने लगा है। मगर जब-जब सामान्य से कुछ अधिक बारिश होती है, पोल खुल जाती है कि शहरी नियोजन में जल निकास पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता। हालांकि शहरों में जगह-जगह जलभराव की नौबत आने के पीछे की कुछ वजहें साफ हैं। रिहाइशी और औद्योगिक इलाकों के जल निकास के लिए बने ज्यादातर नाले खुले हुए हैं और वे आमतौर पर प्लास्टिक के कचरे से भरे रहते हैं। बरसात से पहले उनकी सफाई न हो पाने के कारण उनसे पानी नहीं निकल पाता। यही स्थिति नदियों की होती गई है। गाद और कचरा भरते जाने और उनके किनारों तक रिहाइशी बस्तियां फैल जाने के कारण उनका पेटा उथला और पाट सिकुड़ता गया है, उनकी जल संग्रहण क्षमता काफी घट गई है, इसलिए बरसात के समय उफन कर उनका पानी शहरों के निचले हिस्सों में फैल जाता है।

नदियों में कचरे के प्रवाह को रोकने की अब तक की तमाम योजनाएं विफल साबित हुई हैं। नदियों के पाटों पर अतिक्रमण रोकने में प्रशासन नाकाम रहा है। इसी तरह शहरों में बढ़ती आबादी के मुताबिक नागरिक सुविधाएं जुटाने और गैरकानूनी तरीके से बसती बस्तियों पर नजर रखने में लापरवाही का आलम है। भवन निर्माण में नियम-कायदों की अनदेखी आम है। सड़कों और पुलों के निर्माण में कमीशनखोरी और कमाई की प्रवृत्ति पर रोक लगाना चुनौती बना हुआ है। यही वजह है कि बरसात में अक्सर सड़कों-पुलों के धंसने, मकानों के धसकने और धराशायी हो जाने की घटनाएं होती हैं और लोगों को नाहक अपनी जान गंवानी पड़ती है। हर साल बरसात शहरी नियोजकों को संकेत दे जाती है कि उन्हें किन कमजोरियों को दुरुस्त करने की जरूरत है, पर विडंबना है कि बरसात बीतती है और उसे भुला दिया जाता है। जब तक यह लापरवाही खत्म नहीं होगी, बरसात में शहरों को जलमग्न होने से रोकना मुश्किल बना रहेगा।

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