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संपादकीयः वसूली की हद

गौरतलब है कि हिंसा के दौरान संपत्ति के नुकसान की वसूली के मसले पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से बिल्कुल स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं और कोई भी सरकार अगर वसूली जैसा कदम उठाती है तो वह उन निर्देशों के मुताबिक ही कर सकती है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी उत्तर प्रदेश सरकार को इस बात की हिदायत दी है।

हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए साफ लहजे में कहा कि यह नागरिकों की निजता का हनन है और इन्हें तत्काल हटा लिया जाए।

लखनऊ में पिछले साल दिसंबर में नागरिकता संशोधन कानून के मसले पर हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा में संपत्ति का भारी नुकसान हुआ था। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके लिए आरोपों के घेरे में आए लोगों से नुकसान की भरपाई कराने को लेकर सख्त कदम उठाया। लेकिन इसके लिए उसने जो तौर-तरीके अपनाए, वे सवालों के कठघरे में हैं। दरअसल, राज्य सरकार ने आरोपियों के खिलाफ जिस तरह के प्रचारात्मक उपायों का सहारा लिया, उन पर शुरू से ही आपत्ति उठाई जा रही थी। अब इस मामले पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का जो रुख सामने आया है, उससे साफ है कि सरकार ने लोकतंत्र और कानून के तकाजे को किनारे कर शायद हड़बड़ी में संयम रखना जरूरी नहीं समझा। गौरतलब है कि सीएए के मुद्दे पर हुए विरोध प्रदर्शनों के हिंसक होने और संपत्ति के नुकसान के लिए राज्य की पुलिस ने कई लोगों को आरोपी माना था। चूंकि राज्य सरकार आरोपियों से भरपाई के रास्ते को ही प्राथमिक हल मान रही है, इसलिए इस मामले में भी सत्तावन लोगों की पहचान फोटो सहित पूरा पता और परिचय होर्डिंगों पर छपवा कर जिले के चौक-चौराहों पर लगवा दिए।

सरकार की नजर में नुकसान की वसूली का यह रास्ता ज्यादा जरूरी और कारगर हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह तरीका लोकतांत्रिक और कानूनी कसौटी पर भी पूरी तरह उचित है? आरोपी व्यक्तियों की तस्वीर और नाम-पते वाले पोस्टर लगाने का मामला सामने आने के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस पर स्वत: संज्ञान लिया और बिना देरी करते हुए संबंधित अधिकारियों को अदालत में तलब किया। अदालत ने सबसे पहला सवाल यही उठाया है कि किस अधिकार से ये नोटिस जारी किए गए हैं और इस तरह के होर्डिंग लगाए गए हैं। हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए साफ लहजे में कहा कि यह नागरिकों की निजता का हनन है और इन्हें तत्काल हटा लिया जाए। हालांकि इसके लिए सोलह मार्च तक रिपोर्ट दाखिल करने का वक्त दे दिया गया। यह इस समूचे मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए शायद ज्यादा वक्त है। फिर भी अदालत ने इस मामले के आधार और कानूनी पहलुओं को देखने के बाद ही सरकार के रुख पर सवाल उठाए होंगे। अगर ये आपत्तियां सही हैं तो सरकार और संबंधित अधिकारियों को उनका खयाल रखना जरूरी क्यों नहीं लगा?

गौरतलब है कि हिंसा के दौरान संपत्ति के नुकसान की वसूली के मसले पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से बिल्कुल स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं और कोई भी सरकार अगर वसूली जैसा कदम उठाती है तो वह उन निर्देशों के मुताबिक ही कर सकती है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी उत्तर प्रदेश सरकार को इस बात की हिदायत दी है। लेकिन सच यह है कि राज्य सरकार ने आरोपियों का समूचा ब्योरा सार्वजनिक करने का जो तरीका अपनाया है, वह न केवल उनकी निजता का हनन है, बल्कि इससे उनकी सुरक्षा को खतरा भी पैदा हो सकता है। अदालत ने भी यह साफ कहा कि सरकार ऐसा काम नहीं कर सकतीं, जिससे किसी की निजता का हनन हो और उसकी सुरक्षा को खतरा पैदा हो जाए। कई जगहों पर भीड़ में तब्दील हुए लोगों के हाथों महज अफवाह के आधार पर किसी व्यक्ति पर हमला करने और पीट-पीट कर मार डालने की घटनाएं किसी से छिपी नहीं हैं। ऐसे में अगर संपत्ति वसूली के आरोप भविष्य में साबित भी हो जाएं तो उसके बदले हर्जाना वसूली के लिए प्रचारात्मक कदमों के बजाय क्या सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत विधिसम्मत तरीके अपनाना उचित नहीं होगा?

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