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संपादकीय : उम्मीद और चुनौती

हाल में रिजर्व बैंक ने भी अपनी मौद्रिक नीति में चौथी बार नीतिगत दरों में कटौती है और साथ ही बैंकों पर कर्ज सस्ता करने के लिए दबाव बनाया है।

Author नई दिल्ली | August 13, 2019 4:10 AM
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वित्त मंत्री ने रियल एस्टेट कारोबार को मंदी से उबारने की दिशा में जो पहल शुरू की है उससे यह उम्मीद बंधती है कि सरकार आने वाले दिनों में ऐसे बड़े कदम उठाएगी, जिनसे इस क्षेत्र में पिछले चार-पांच साल से चला आ रहा संकट खत्म हो और बिल्डरों के साथ-साथ ग्राहकों का भी भला हो। अभी रियल एस्टेट क्षेत्र एक तरह से दम तोड़े हुए है। जायदाद खरीदने-बेचने का कारोबार करने वाले सड़क पर हैं और सिर्फ बड़े कारोबारी थोड़ी-बहुत हिम्मत से डटे हैं। रियल एस्टेट में लंबे समय से खरीदार नहीं हैं। नोटबंदी के बाद यह संकट और गहराता चला गया। ये उसी का असर है कि आज लाखों फ्लैट बन कर तैयार हैं, लेकिन खरीदार नहीं हैं।

जमीन-जायदाद का कारोबार दरअसल लंबे समय से नगदी संकट की मार झेल रहा है। इसकी एक वजह यह भी है कि बैंक और गैरबैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) पहले तो इस क्षेत्र के लिए पैसे दे रही थीं, लेकिन अब इन्होंने हाथ खींच लिए हैं। एनबीएफसी तो खुद नगदी संकट में फंसी हैं और ऐसी आशंका भी बनी हुई है कि कहीं इन्हें भी एनपीए की बीमारी न लग जाए।

रियल एस्टेट क्षेत्र में जान फूंकने के लिए सरकार को एक साथ कई मोर्चों पर जूझना होगा। इनमें सबसे जटिल काम इस क्षेत्र को पूंजीमुहैया कराने का है, ताकि बिल्डर अटकी हुई परियोजनाएं पूरी कर सकें। दूसरी बड़ी समस्या मकान खरीदारों को लेकर है। आम्रपाली, जेपी जैसे कुछ बड़े समूहों की परियोजनाओं में बयालीस हजार से ज्यादा लोगों के पैसे फंसे हुए हैं और सर्वोच्च अदालत ने अब इनका काम पूरा करने और लोगों को मकान दिलाने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर डाली है। इसलिए ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि सरकार अटकी परियोजनाओं को पूरा करने और खरीदारों को संकट से निकालने के लिए अलग से कोष बना सकती है।

हाल में रिजर्व बैंक ने भी अपनी मौद्रिक नीति में चौथी बार नीतिगत दरों में कटौती है और साथ ही बैंकों पर कर्ज सस्ता करने के लिए दबाव बनाया है। आने वाले दो-तीन महीने त्योहारों के हैं और इनमें जमीन-जायदाद की खरीदारी खासतौर से होती है। अगर बैंक कर्ज सस्ता करते हैं तो इससे भी रियल एस्टेट क्षेत्र को पटरी पर लाने में मदद मिलेगी।

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस वक्त फिर से मंदी जैसे हालात का सामना कर रही है। ऐसे में रियल एस्टेट उद्योग को फिर से खड़ा कर पाना कोई आसान काम नहीं हैं। उसे हर स्तर पर भारी रियायतों की जरूरत है। इसीलिए बिल्डरों और क्रेडाई (कनफेडरेशन आॅफ रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन आॅफ इंडिया) और नारेडको (नेशनल रियल एस्टेट डेवलपमेंट काउंसिल) ने सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया है कि सरकार बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों पर इस क्षेत्र में पैसा डालने के लिए दबाव बनाए। लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर बैंक पहले ही एनपीए की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। ऐसे में वे कोई जोखिम नहीं ले सकते।

सीमेंट और इस्पात जैसे क्षेत्र रियल एस्टेट कारोबार पर टिके होते हैं। इसमें मंदी का मतलब है सीमेंट और इस्पात जैसे उद्योगों पर खतरा मंडराना। इसलिए सरकार को अब ऐसी रणनीति बनानी होगी, जिसमें बैंकों के जोखिम का खयाल रखते हुए रियल एस्टेट उद्योग में पैसा डलवाया जाए, ताकि इससे जुड़े दूसरे प्रमुख क्षेत्रों में भी मंदी के हालात दूर हों। मंदी की वजह से बड़ी संख्या में लोगों का रोजगार जा रहा है, यह भी कम गंभीर चिंता का विषय नहीं है। ऐसे में सरकार के प्रयास कहां तक सफल हो पाते हैं, यह आने वक्त ही बताएगा!

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