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करार बेकरार

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का गणतंत्र दिवस के मौके पर अतिथि बन कर आना निस्संदेह उल्लेखनीय कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ गर्मजोशी से उनका स्वागत किया, अनौपचारिक होकर सबके सामने उन्हें संबोधित किया, बल्कि पूरे उत्साह के साथ दोहराते रहे कि ओबामा के साथ उनकी दोस्ती गाढ़ी होती जाने का […]

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का गणतंत्र दिवस के मौके पर अतिथि बन कर आना निस्संदेह उल्लेखनीय कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ गर्मजोशी से उनका स्वागत किया, अनौपचारिक होकर सबके सामने उन्हें संबोधित किया, बल्कि पूरे उत्साह के साथ दोहराते रहे कि ओबामा के साथ उनकी दोस्ती गाढ़ी होती जाने का नतीजा है कि दोनों देशों के रिश्ते काफी गहरे हुए हैं। इस दौरान बहु प्रतीक्षित असैन्य परमाणु करार की बाधाओं को दूर करते हुए हस्ताक्षर किए गए। रक्षा क्षेत्र में भी समझौते हुए। नरेंद्र मोदी इन्हें अपनी उपलब्धियों में शुमार कर रहे हैं। करीब आठ साल से भारत और अमेरिका के बीच असैन्य परमाणु करार लटका हुआ था। यह नहीं भूलना चाहिए कि तत्कालीन यूपीए सरकार ने इस करार को आगे बढ़ाया था, और यह लगभग अपने अंतिम स्वरूप में पहुंच गया था, मगर भाजपा सहित तमाम विपक्षी और वाम दलों ने इस पर काफी शोर मचाया था। इसके चलते भारत को परमाणु उत्तरदायित्व कानून का प्रस्ताव जोड़ना पड़ा था, तब कहीं विरोध करने वाले दलों ने संतोष की सांस ली थी। मगर अमेरिका ने इसे मानने से इनकार कर दिया था। अमेरिका यह भी मानने को तैयार नहीं था कि भारत में लगने वाले परमाणु रिएक्टरों पर वह अपनी निगरानी रखने की जिद छोड़ दे। अब वह इस बात पर राजी हो गया है कि परमाणु रिएक्टरों पर निगरानी की जिम्मेदारी उसके बजाय अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा अधिकरण यानी आइएइए निभाएगा। इस बात पर तो यूपीए सरकार ने भी अमेरिका को लगभग राजी कर लिया था। असल अड़चन आई थी परमाणु उत्तरदायित्व कानून को लेकर। लिहाजा उस पर मोदी सरकार ने भारतीय अपेक्षाओं के अनुरूप समझौता नहीं किया है। विचित्र है कि इस मामले में यूपीए सरकार का विरोध करने वालों में भाजपा सबसे आगे थी, मगर मोदी को वह बात ध्यान नहीं रही। किसी हादसे की स्थिति में मुआवजे के भुगतान की जिम्मेदारी परोक्ष रूप से सरकार ने अपने ऊपर ले ली है।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के मद्देनजर परमाणु बिजली घरों से संबंधित परियोजनाओं को जितना जल्दी हो सके आगे बढ़ाया जाना चाहिए। अमेरिका के साथ हुए करार के बाद पहले से तय आंध्र प्रदेश और गुजरात में लगने वाले अमेरिकी बिजलीघरों को गति मिलेगी। मगर इन कंपनियों की जवाबदेही ठीक से तय न किए जाने से विवाद की गुंजाइश बनी हुई है। परमाणु हादसे के वक्त मुआवजे के लिए पंद्रह सौ करोड़ रुपए का एक बीमा कोष तैयार करने पर रजामंदी हुई है, जिसमें आधा पैसा बिजली कंपनियां देंगी और आधा सरकार। यानी नागरिकों के राजस्व का बड़ा हिस्सा इन कंपनियों के कारोबार की सुरक्षा में लगा दिया जाएगा। अमेरिका ने भले आश्वस्त किया है कि वह भारत को दुनिया के चार महत्त्वपूर्ण परमाणु निर्यात नियंत्रण संगठनों में सदस्यता दिलाने का प्रयास करेगा। मगर इसे लेकर इसलिए बहुत उत्साहित होने की जरूरत नहीं कि यह तभी संभव हो पाएगा जब इस पर चीन की रजामंदी होगी। ऐसा होना आसान नहीं लगता। इसी तरह रक्षा क्षेत्र में हुए समझौतों को मोदी सरकार अपनी उपलब्धियों में भले शुमार कर रही है, पर यह स्पष्ट है कि इससे भारत के हित उतने नहीं सधेंगे, जितने अमेरिकी सैन्य साजो-सामान बनाने वाली कंपनियों के। इसलिए इन समझौतों को विरोध से परे नहीं माना जा सकता। यह अलग बात है कि संसद में मोदी सरकार के सामने वैसी स्थिति नहीं है, जैसी यूपीए सरकार के सामने थी।

 

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