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हंगामे का सदन

संसद के मानसून सत्र में हंगामे की स्थिति पहले ही बन चुकी थी। इसलिए चालू सत्र के पहले दिन जिस तरह राज्यसभा में कार्यवाही नहीं चलने पाई, वह कोई हैरानी की बात नहीं। यों सरकार का कहना है कि वह विपक्ष के साथ विभिन्न विषयों पर चर्चा के लिए तैयार है, पर संसद को सुचारु […]

संसद के मानसून सत्र में हंगामे की स्थिति पहले ही बन चुकी थी। इसलिए चालू सत्र के पहले दिन जिस तरह राज्यसभा में कार्यवाही नहीं चलने पाई, वह कोई हैरानी की बात नहीं। यों सरकार का कहना है कि वह विपक्ष के साथ विभिन्न विषयों पर चर्चा के लिए तैयार है, पर संसद को सुचारु रूप से चलाने को लेकर उसमें भी गंभीरता का अभाव नजर आता है। कांग्रेस और वाम दलों सहित विपक्ष इस मांग पर अड़ा हुआ है कि पहले ललित मोदी, व्यापमं घोटाले आदि के आरोपी मंत्री-मुख्यमंत्री इस्तीफा दें फिर सदन में चर्चा हो।

सरकार ने साफ कर दिया है कि उसका कोई भी मंत्री इस्तीफा नहीं देगा। पिछले संसद सत्र का काफी हिस्सा भूमि अधिग्रहण विधेयक और धर्मांतरण के मुद्दे पर हंगामे की भेंट चढ़ गया था। इसके चलते कई अहम विधेयक मंजूरी की बाट जोहते रह गए। इस सत्र में भी अगर वही हाल रहा तो सरकार की मुश्किलें बढ़ती जाएंगी। हालांकि यूपीए सरकार के समय राष्ट्रमंडल खेल, दूरसंचार स्पेक्ट्रम, कोयला खदान आबंटन आदि में हुई अनियमितताओं को लेकर भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने कम बाधा नहीं पहुंचाई। कई सत्र बिना किसी कामकाज के समाप्त हो गए। कांग्रेस इसकी भुक्तभोगी है, उसे पता है कि इस तरह सदन में हंगामे का सरकार के कामकाज पर कैसा प्रतिकूल असर पड़ेगा। इसलिए उससे अपेक्षा स्वाभाविक है कि बदले की भावना से संसद में गतिरोध पैदा करने के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत कामकाज होने दे। संसद आखिर मुद्दों पर चर्चा का मंच है, उसे जोर आजमाइश का अखाड़ा क्यों बनाया जाना चाहिए।

पर संसद को सुचारु रूप से चलाने देना एकतरफा समझौते का मामला भी नहीं है। इसमें सत्तापक्ष से अधिक लोकतांत्रिक और व्यावहारिक कदम की उम्मीद की जाती है। जबकि भाजपा ने इस पर गंभीरता दिखाने के बजाय अड़ियल रुख अपना रखा है। वह संसद में चर्चा की अपील तो कर रही है, पर उसका भाव यही है कि ललित मोदी से सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे की निकटता, व्यापमं घोटाले में शिवराज सिंह चौहान और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अनियमितता में रमन सिंह को दोषी ठहराने के बजाय उस पर बातचीत की जाए। माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने ठीक कहा है कि ये मामले आपराधिक हैं, इन पर संसद में बहस के जरिए फैसला नहीं सुनाया जा सकता। आरोपी नेताओं को नैतिक आधार पर तब तक अपने पद से अलग रहना चाहिए जब तक उनसे जुड़े मामलों में अदालत का फैसला नहीं आ जाता।

मगर भाजपा को लगता है कि अगर इस्तीफों का सिलसिला शुरू हुआ तो उसकी राजनीतिक छवि खराब होगी। बिहार आदि राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसका जनाधार खिसक सकता है। हालांकि भाजपा में ऐसे उदाहरण हैं जब उसके वरिष्ठ नेताओं पर किसी अनियमितता का आरोप लगा तो उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया। लालकृष्ण आडवाणी अपने उदाहरण से इसका संकेत भी दे चुके हैं कि दागी नेताओं को अपने पद से हट जाना चाहिए। संसद में भले भाजपा विपक्षी दलों के सवालों पर अपनी दलीलों से खुद को सही साबित करने का प्रयास कर ले, पर इससे उसकी किरकिरी कम नहीं होने वाली। जिस शुचिता और पारदर्शिता का दावा भाजपा करती रही है, अपनी इस जिद के बाद वह उस कसौटी पर खुद को कितना खरा साबित कर पाएगी! विपक्ष की मांग मान लेने में उसे गुरेज नहीं होनी चाहिए।

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