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संपादकीय: घाटी में चुनौती

आतंकवाद पर काबू पाने के लिए सुरक्षाबलों की सख्ती से इनकार नहीं किया जा सकता। सीमा पार से मिलने वाली इमदाद और घुसपैठ पर पूरी तरह रोक लगाना भी जरूरी है। कश्मीर सीमा पर छियानबे नई सुरक्षा चौकियां बनाने का सरकार का फैसला इस दिशा में अच्छा कदम कहा जा सकता है।

Author May 7, 2018 3:28 AM
सेना के जवानों की फाइल फोटो।

पिछले कुछ महीनों से सुरक्षा बल कश्मीर घाटी में दहशतगर्दों की पहचान और उनके सफाए का अभियान चला रहे हैं। उसमें कई आतंकवादी मारे जा चुके हैं। पिछले दो दिनों में शोपियां में हिज्बुल मुजाहिदीन के पांच और छत्ताबल में लश्कर-ए-तैयबा के तीन आतंकवादियों का मारा जाना इसकी ताजा कड़ी है। शोपियां मुठभेड़ में हिज्बुल का क्षेत्रीय कमांडर सद्दाम पैडर भी मारा गया। बताया जा रहा है कि वह बुरहान वानी के नजदीकी लोगों में था। इस तरह एक बार फिर घाटी में हिज्बुल की रीढ़ पर चोट पहुंची है। इसे निस्संदेह सुरक्षाबलों की बड़ी कामयाबी कहा जा सकता है। पर जिस तरह घाटी के नागरिक ठिकानों से सुरक्षाबलों को आतंकवादियों की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, उससे साफ है कि इन्हें पहुंचने वाली आर्थिक और साजो-सामान संबंधी मदद रोक पाने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है। बुरहान वानी के मारे जाने के बाद पूरा कश्मीर आंदोलित हो उठा था और खासकर युवाओं ने बड़े पैमाने पर हिज्बुल की सदस्यता ली थी। महीनों घाटी में पत्थरबाजी और नागरिक आक्रोश का माहौल बना रहा। उससे निपटने के लिए अलगाववादी संगठनों के सीमा पार संबंधों और उनके बैंक खातों पर कड़ी नजर रखी जाने लगी। सीमा पार से आतंकी संगठनों को मिलने वाली इमदाद रोकने का दावा किया गया, फिर भी अगर घाटी के युवा आतंकी संगठनों से जुड़ कर चुनौती दे रहे हैं, तो उन वजहों पर ध्यान देने की जरूरत रेखांकित होती है।

शोपियां की ताजा मुठभेड़ में मारे गए आतंकियों में कश्मीर विश्वविद्यालय का एक असिस्टेंट प्रोफेसर भी शामिल है। छिपी बात नहीं है कि दहशतगर्द युवाओं को बरगलाने के लिए विभिन्न संस्थानों में अपने लोगों को स्थापित करते हैं। मारा गया असिस्टेंट प्रोफेसर मोहम्मद रफी भट भी इसी योजना के तहत विश्वविद्यालय में काम कर रहा होगा कि वह युवाओं को बरगला सके। सुरक्षाबल और खुफिया एजंसियां अगर ऐसे लोगों की पहचान करने में कामयाब हो रही हैं, तो इससे युवाओं को भटकाने के प्रयासों पर नकेल कसने की उम्मीद बनती है। दरअसल, कश्मीर में रोजगार के नए अवसर उपलब्ध न होने की वजह से बहुत सारे युवा बेकार हैं और वे बड़ी आसानी से कट्टरपंथियों की तकरीरों और अलगाववादियों के बहकावे में आ जाते हैं। फिर बहुत सारे युवाओं के मन में अपने किसी परिजन के साथ सुरक्षाबलों की ज्यादतियों की कसक है, जिसे आतंकी संगठन उकसाने और उन यादों के जरिए उनमें आक्रोश भरने में कामयाब हो जाते हैं। परिजनों के साथ हुई ज्यादतियां ही वहां के सामान्य नागरिकों को भी विद्रोह पर उतरने को बाध्य करती हैं।

आतंकवाद पर काबू पाने के लिए सुरक्षाबलों की सख्ती से इनकार नहीं किया जा सकता। सीमा पार से मिलने वाली इमदाद और घुसपैठ पर पूरी तरह रोक लगाना भी जरूरी है। कश्मीर सीमा पर छियानबे नई सुरक्षा चौकियां बनाने का सरकार का फैसला इस दिशा में अच्छा कदम कहा जा सकता है। पर घाटी के आम नागरिकों में व्याप्त आक्रोश को शांत करने और युवाओं के गुमराह होने से बचाने के लिए वही तरीके नहीं काम आ सकते, जो सीमा पर आतंकवादियों से निपटने में काम आते हैं। सीमा पर सुरक्षा उपाय कड़े हों, पर अपने नागरिकों के साथ बातचीत के जरिए अमन की सूरत बहाल करने की कोशिशें भी चलती रहनी चाहिए। बातचीत का सिलसिला बंद हो जाने से नागरिकों के आतंकी संगठनों के प्रति हमदर्दी या उनके प्रति झुकाव बढ़ने की आशंका बनी रहती है।

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